रूस-यूक्रेन की युद्ध की वजह से दुनिया के कई देशों पर भयंकर संकट पैदा हो गया है। विश्व में गेहूं के दो मुख्य उत्पादकों रूस और यूक्रेन के बीच युद्ध के कारण मध्य-पूर्व और उत्तरी अफ्रीका के देशों में गेहूं की भारी कमी हो गई है। भारत और चीन के बाद सबसे अधिक गेहूं की उपज रूस में होती है और रूस विश्व में गेहूं का सबसे बड़ा निर्यातक है।

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यूक्रेन दुनिया के पांच सबसे बड़े गेहूं के निर्यातकों में से एक है। मध्य-पूर्व और उत्तरी अफ्रीका को सबसे अधिक गेहूं यूक्रेन और रूस से ही मिलता है। युद्ध ने इस व्यापार को गंभीर रूप से प्रभावित किया है और आयातक देशों में गेंहू की भारी किल्लत हो गई है।

गेहूं की फसल जुलाई में शुरू होती है और इस साल की उपज काफी अच्छी रहने की उम्मीद है। अगर परिस्थितियां सामान्य रहीं तो वैश्विक बाजार में गेहूं की प्रचुर आपूर्ति होगी लेकिन यूक्रेन में युद्ध लंबा खिंचता है तो देश में गेहूं की फसल प्रभावित हो सकती है। इस कारण वैश्विक आपूर्ति भी प्रभावित होगी।

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इसके अलावा, यूक्रेन पर रूसी हमले के जवाब में पश्चिमी देशों ने अंतर्राष्ट्रीय स्विफ्ट बैंकिंग प्रणाली से कुछ रूसी बैंकों को प्रतिबंधित कर दिया है। इससे रूस के निर्यात पर असर पड़ेगा और गेहूं का निर्यात भी प्रभावित होगी।

मध्य-पूर्व के देश यूक्रेन और रूस से ही अपनी जरूरत का गेहूं का आयात करते हैं। तुर्की अपनी जरूरत का आधा हिस्सा ही देश में उत्पादित करता है। अपने गेहूं आयात का 85 प्रतिशत हिस्सा तुर्की, रूस और यूक्रेन से खरीदता है. तुर्की के स्टैटिक्स इंस्टिट्यूट के आंकड़ों के अनुसार, साल 2021 में तुर्की ने यूक्रेन से रिकॉर्ड स्तर पर गेहूं का आयात किया है।

तुर्की पहले से ही आर्थिक तंगी की मार झेल रहा है और उसकी मुद्रा लीरा में भारी गिरावट देखने को मिली है। तुर्की में खाद्यान्न की कीमतें आसमान छू रही हैं और लोगों का मुख्य आहार ब्रेड काफी महंगा हो गया है। आम लोग महंगी ब्रेड खरीद नहीं पा रहे हैं जिस कारण सरकार आम लोगों के लिए सस्ती दरों पर ब्रेड दे रही है। लेकिन गेहूं के आयात पर असर पड़ने से लोगों के लिए ब्रेड खरीदना और मुश्किल हो जाएगा और सरकार भी आम लोगों को सस्ती ब्रेड देने में अक्षम हो जाएगी।

अरब दुनिया की अधिकांश अर्थव्यवस्थाएं गेहूं के आयात पर बहुत अधिक निर्भर हैं। मिस्र तो बहुत ही अधिक.... वो अपने गेहूं के आयात के 85 प्रतिशत के लिए रूस और यूक्रेन पर निर्भर है। ट्यूनीशिया अपने गेहूं के आयात का 50 से 60 प्रतिशत हिस्सा यूक्रेन से लेता है।

रूस-यूक्रेन संकट से उत्तरी अफ्रीका के देश भी भारी संकट का सामना कर रहे हैं। यमन और सूडान के अलावा मिस्र, ट्यूनीशिया और लेबनान को कीमतों में वृद्धि का सामना करना पड़ रहा है और जल्द ही इन देशों की मांग में भी वृद्धि होगी।