आज नागरिता कानून के खिलाफ पूरे देश में विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं और कई जगहों पर धारा 144 लगी हुई। लेकिन कई लोग धारा 144 को कर्फ्यू

तक कह देते हैं जो कि गलत है। क्योंकि धारा 144 और कर्फ्यू में भारी अंतर है। आपको यह भी बता दें कि धारा 144 अंग्रेजों की देर है और इस कानून की रचना एक भारतीय अफसर ने की थी। 

कहा जाता है कि धारा 144 के शिल्पकार राज रत्न ईएफ देबू नाम के एक अफसर थे। उन्होंने ही इसके नियम बनाए थे और बड़ौदा स्टेट में 1861 में पहली बार इसका इस्तेमाल किया गया था। इसके इस्तेमाल से बड़ौदा स्टेट में अपराध पर काफी काबू पाया जा सका था। अफसर देबू को बड़ौदा के महाराजा गायकवाड़ ने स्वर्ण पदक से भी सम्मानित किया था।

बताया जाता है कि राष्ट्रवादी प्रदर्शनों पर शिकंजा कसने के लिए ब्रिटिश शासन में धारा 144 कानून का बार-बार इस्तेमाल किया गया। गांधीजी जी ने इसी ही कानून का उल्लंघन करके चंपारण सत्याग्रह को अंजाम दिया था। लेकिन धारा 144 न सिर्फ आजादी के बाद जारी रही बल्कि इसका इस्तेमाल भी खूब होता आ रहा है। 

आपको बता दें कि सीआरपीसी की धारा 144 शांति कायम करने के लिए उस स्थिति में लगाई जाती है जब किसी तरह के सुरक्षा संबंधित खतरे या दंगे की आशंका हो। धारा-144 जहां लगती है, उस इलाके में 5 या उससे ज्यादा आदमी एक साथ जमा नहीं हो सकते हैं। धारा लागू करने के लिए इलाके के जिलाधिकारी द्वारा एक नोटिफिकेशन जारी किया जाता है। धारा 144 लागू होने के बाद इंटरनेट सेवाओं को भी आम पहुंच से ठप किया जा सकता है। यह धारा लागू होने के बाद उस इलाके में हथियारों के ले जाने पर भी पाबंदी होती है।

आपको बता दें कि धारा 144 और कर्फ्यू एक नहीं है। कर्फ्यू बहुत ही खराब हालतों में लगाया जाता है। उस स्थिति में लोगों को एक खास समय या अवधि तक अपने घरों के अंदर रहने का निर्देश दिया जाता है। मार्केट, स्कूल, कॉलेज आदि को बंद करने का आदेश दिया जाता है। सिर्फ आवश्यक सेवाओं को ही चालू रखने की अनुमति दी जाती है। इस दौरान ट्रैफिक पर भी पूरी तरह से पाबंदी रहती है।

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