कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रुडो ने भारतीय किसान अंदोलन पर जो टिप्पणी की, उसका ‘‘जमीनी वास्तविकता से कोई तालमेल नहीं है और उन्होंने केवल आग में घी डालने का काम किया है।’’ कनाडा में वोट बैंक की राजनीति पर भारतीय राजदूत समूह ने एक खुला पत्र लिखा है, जिसमें यह बात कही गई है।

कनाडा के पूर्व उच्चायुक्त विष्णु प्रकाश सहित कई आईएफएस अधिकारियों के हस्ताक्षरित पत्र में कहा गया है, ‘‘पिछले सप्ताह सिख समुदाय से बातचीत करते समय गुरु नानक देव जी की पुण्यतिथि पर प्रधानमंत्री ट्रुडो ने भारतीय किसान आंदोलन पर चर्चा की और कहा कि ‘स्थिति चिंताजनक है, और हम सभी अपने परिवार और दोस्तों के बारे में बहुत चिंतित हैं’। उनकी टिप्पणियों का जमीनी हकीकत से कोई वास्ता नहीं था और उन्होंने केवल आग में घी डालने का काम किया।’’ पत्र में कहा गया है कि विडंबना देखिए कि कनाडा विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूएचओ) में भारत के न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) का सबसे बड़ा आलोचक रहा है, फिर भी उन्होंने संदिग्ध इरादों से किसानों की चिंता और समर्थन व्यक्त करने के बारे में सोचा।

पत्र में कहा गया, ‘‘भारतीय सरकार आंदोलनकारी किसानों के प्रतिनिधियों से मंत्रिस्तरीय स्तर पर बातचीत कर रही है। फिर भी उन्होंने इसे बड़ी आसानी से नजरअंदाज कर दिया।’’ कनाडाई सरकार यह भी भूल गई कि इस साल की शुरुआत में, संधि के बावजूद, उन्होंने यहां की अपनी पारंपरिक भूमि पर वंशानुगत प्रमुखों के अधिकारों को खारिज कर दिया था। पत्र में कहा गया है कि उनके देश से गुजरने वाली प्राकृतिक गैस पाइपलाइनों के खिलाफ शांतिपूर्ण विरोध को भी बलपूर्वक समाप्त कर दिया गया।एक प्रमुख राष्ट्रीय दैनिक के अनुसार, ‘‘कनाडा को ये तक नहीं मालूम है कि स्वदेशी लोगों को उनके अधिकारों के बारे में संवाद करना भी उनका कर्तव्य है।’’

‘‘भारत में कनाडाई समर्थन से प्रोत्साहित हो कर प्रदर्शनकारी किसानों ने अपना रुख सख्त कर लिया है। अपनी लिबरल पार्टी के एक वर्ग को खुश करने के लिए भारत के आंतरिक मामलों में दखल पूरी तरह से अस्वीकार्य है और यह द्विपक्षीय संबंधों पर असर डालेगा।’’ पत्र में कहा गया है, ‘‘यह कनाडा को उसी की भाषा में जवाब देने के लिए आमंत्रित करता है। भारत कनाडा के साथ अच्छे संबंध रखना चाहता है। हालांकि, कोई भी संबंध एकतरफा नहीं हो सकता, न ही कोई भी देश, विशेष रूप से भारत उन बातों की अनदेखी कर सकता है जो उसके राष्ट्रीय हित और अखंडता पर चोट पहुंचाता हो।’’ पत्र ये भी कहता है कि कुछ कनाडाई राजनीतिक दलों और नेताओं के वोट बैंक की राजनीति के चलते द्विपक्षीय राजनीतिक समीकरण में तनाव पैदा हो सकता है। ‘‘यह सबको मालूम है कि कुछ अलगाववादी और हिंसक खालिस्तानी तत्व कनाडा की धरती से भारत विरोधी गतिविधियों को बढ़ावा दे रहे हैं। वे कनाडा के युवाओं को कट्टरपंथी बना रहे हैं।’’ 

कनाडा में खालिस्तानी तत्व कई प्रमुख गुरुद्वारों को नियंत्रित करते हैं, जो उन्हें पर्याप्त धन पहुंचाते हैं। इनमें से कुछ धन कथित तौर पर राजनीतिक दलों के चुनावी अभियान के लिए लिबरल पार्टी को भी दिया जाता है। वे नियमित रूप से प्रदर्शनों, रैलियों और अन्य कार्यक्रमों में भाग लेते हैं जहां भारत विरोधी नारे लगाए जाते हैं और आतंकवादियों को उकसाया जाता है। कुछ कनाडाई राजनेताओं को ऐसे आयोजनों में भाग लेने पर खुशी होती है जहां अलगाववादियों को प्रचार के लिए ऑक्सीजन मिलती है। खालिस्तानियों और पाकिस्तानी राजनयिकों के बीच सहयोग और समन्वय का खेल भी पर्दे के पीछे चलता रहता है। पाकिस्तानी ‘राजनयिकों’ ने खालिस्तानी समर्थक कार्यक्रमों में भाग लिया, जिस पर से कनाडाई अधिकारियों ने नजरें फेर ली। पत्र में कहा गया है, ‘‘2018 की रिपोर्ट ‘कनाडा पर आतंकवादी खतरा’ में कट्टरपंथी खालिस्तानियों और सिख उग्रवाद के कई संदर्भ मिलते हैं। हालांकि, कथित तौर पर उनके दबाव और धमकियों के बाद उन सभी संदर्भों को इस रिपोर्ट से हटा दिया गया।’’ 

अंत में पत्र में कहा गया है कि संपादकीय बाजीगरी घरेलू उद्देश्यों के लिए अच्छी हो सकती है, लेकिन यह भी सत्य है कि अंतर्राष्ट्रीय कानून के तहत न तो कनाडा और न ही कोई अन्य देश कट्टरवाद, हिंसक उग्रवाद या आतंकवाद को बढ़ावा दे सकता है। जिन आईएफएस अधिकारियों ने इस पत्र पर हस्ताक्षर किए हैं, उनमें अजय स्वरूप, अमरेंद्र खटुआ, अनिल के. त्रिगुणायत, अशोक सज्जनहर, भासवती मुखर्जी, जी.एस. अय्यर, जे.एस. सपरा, लक्ष्मी पुरी, मोहन कुमार, ओ.पी.गुप्ता, प्रभु दयाल, आर.सी. अरोड़ा, आर. दयाकारा, सतीश चंद मेहता, एस. माथुर, श्यामला बी. कौशिक, सुरेश कुमार गोयल, वीना सीखरी, विद्या सागर वर्मा, वीरेंद्र गुप्ता और योगेश गुप्ता शामिल हैं।