यौन उत्‍पीड़न के एक मामले में केरल हाईकोर्ट ने कहा कि पीड़िता की थाईज के साथ की गई गलत हरकत भी निश्चित रूप से आईपीसी की धारा 375(c) के तहत बलात्‍कार के बराबर है।

वर्ष 2015 से संबंधित मामले में, जहां कक्षा 6 की एक छात्रा का उसके पड़ोसी ने यौन उत्‍पीड़न किया था। पड़ोसी ने छात्रा को अश्‍लील क्लिप दिखाकर उसके थाईज से गंदी हरकत की थी। मामला तूल पकड़ने के बाद निचली अदालत में सुनवाई हुई और पॉक्‍सो एक्‍ट एवं अप्राकृतिक यौन संबंध मामले में आरोपी को उम्रकैद की सजा सुनाई गई।

जब मामला केरल हाईकोर्ट में आया तो सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कहा क‍ि पीड़िता की थाईज में की गई हरकत भी धारा 375 (सी) के तहत परिभाषित ‘बलात्कार’ ही है। इसके साथ ही कोर्ट ने कहा कि किसी भी महिला के शरीर के किसी भी हिस्‍से के साथ इस तरह की हरकत करना बलात्‍कार के बराबर है।

बता दें कि एक चिकित्‍सीय जांच के दौरान छात्रा ने पड़ोसी द्वारा किए गए यौन कृत्‍य के बारे में बताया था। उसने बताया था कि पड़ोसी कई बार उसका उत्‍पीड़न कर चुका है। जिसके बाद छात्रा की मां ने पड़ोसी के खिलाफ मामला दर्ज कराया था और ट्रायल कोर्ट में सुनवाई शुरू हुई। उस वक्‍त कोर्ट के सामने जो साक्ष्‍य पेश किए गए, उसमें अभियुक्‍त अपने ऊपर लगे आरोपों में दोषी पाया गया और उसे उम्रकैद की सजा सुनाई गई।

ट्रायल में पड़ोसी पर POCSO एक्ट के सेक्‍शन 11(i) रीड/व‌िद 12, सेक्‍शन 9(l) (m) रीड/व‌िद सेक्‍शन 10, सेक्‍शन 3(c) रीड/व‌िद सेक्शन 5 (m) और सेक्‍शन 6, सेक्‍शन, IPC के सेक्शन 375(c) रीड/व‌िद सेक्‍शन 376(2) (i), सेक्‍शन 377, सेक्‍शन 354, सेक्‍शन 354A(1) (i) के तहत दोषी पाया गया। निचली अदालत ने उसे उम्र कैद की सजा सुनाई थी।

अभी कुछ दिन पहले ही केरल हाईकोर्ट ने माता-पिता या नागरिकों के कानूनी रक्षक की भूमिका निभाते हुए एक मानसिक रूप से विकलांग रेप पीड़िता के 15 हफ्ते से अधिक के गर्भ को नष्‍ट करने को अनुमति दी। कोर्ट का कहना था कि पीड़िता स्‍वयं निर्णय लेने में असमर्थ है और उसके लिए यही अच्‍छा फैसला है। हाईकोर्ट ने सरकारी मानसिक स्वास्थ्य केंद्र और तिरुवनंतपुरम में श्री एविटोम थिरुनल अस्पताल को गर्भताप कराने की अनुमति दी है। इसके साथ ही कोर्ट ने इन अस्‍पतालों को भ्रूण के टिशू लेने और डीएएन जांच के लिए इसे बनाए रखने का भी निर्देश दिया है। क्‍योंकि यह मानसिक रूप से विकलांग महिला बलात्‍कार पीड़िता है।