अमेरिका की यूनाइटेड स्टेट्स कमीशन ऑन इंटरनेशनल रिलीजियस फ्रीडम यानि USCIRF ने अपनी वार्षिक रिपोर्ट जारी की है। लेकिन, एकबार फिर इस रिपोर्ट में भारत को लेकर धार्मिक आधार पर भेदभाव करने का आरोप लगाया गया है। इसमें सुझाव दिया गया है कि भारत को अभी विशेष चिंता वाले देश की श्रेणी में रखा जाए। इस रिपोर्ट में जोर देकर कहा गया है कि भारत में अल्पसंख्यक समुदाय के साथ भेदभाव होता है और हिंदू राष्ट्र बनाने पर जोर दिया जा रहा है।

यह भी पढ़ें : सिक्किम को लेकर पेमा खांडू का बड़ा ऐलान, इन राज्यों की तिकड़ी करेगी कमाल

इस रिपोर्ट में कहा गया कि पिछले साल भारत द्वारा उन आवाजों को सबसे ज्यादा दबाया गया जो या तो सरकार के खिलाफ रहीं या फिर जो अल्पसंख्यक समाज की तरफ से उठाई गईं। रिपोर्ट में लिखा है कि 2021 में भारत सरकार द्वारा विरोध के सुरों को दबाया गया है, जिन्होंने अल्पसंख्यक समाज की आवाज उठाई या फिर उनकी पैरवी की। उन पर UAPA और देशद्रोह के तहत मामले दर्ज किए गए। ऐसा पाया गया है कि UAPA और देशद्रोह कानून के जरिए भय का माहौल बनाने का प्रयास किया गया और उन लोगों को चुप किया गया जो सरकार के खिलाफ बोलते।

USCIRF ने अपनी रिपोर्ट में भीमा कोरेगांव हिंसा के आरोपी स्टेन स्वामी का भी जिक्र किया जिनका पिछले साल 84 साल की उम्र में निधन हो गया। इसके अलावा रिपोर्ट में इस बात पर भी आपत्ति जताई गई कि त्रिपुरा में जिन पत्रकारों ने मस्जिदों पर हुए हमलों को लेकर ट्वीट किया, उन्हीं पर UAPA के तहत कार्रवाई की गई। इतना ही नहीं बल्कि इस रिपोर्ट में आरोप लगाया गया कि धर्मांतरण विरोधी कानूनों का इस्तेमाल सिर्फ इंटरकास्ट मैरेज के खिलाफ किया जा रहा है।धर्मांतरण का ही जिक्र करते हुए USCIRF की तरफ से उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का भी नाम लिया गया है।

USCIRF ने अपनी रिपोर्ट में भारत सरकार द्वारा ला गए CAA कानून का भी खुलकर विरोध किया।इसे भेदभाव वाला बताते हुए लिखा गया कि असम में जो एनआरसी प्रक्रिया की गई, उस वजह से 19 लाख लोग लिस्ट से बाहर कर दिए गए। इस रिपोर्ट में किसान आंदोलन का भी जिक्र करते हुए बड़ा आरोप लगाया। कहा गया कि एक देशव्यापी आंदोलन में शामिल हुए सिखों को 'आतंकवादी' बताया गया।

यह भी पढ़ें :गर्मियों में है सिक्किम में सुकून, दोस्तों के साथ प्लान कर सकते हैं ट्रिप

हालांकि, फिहाल USCIRF की इस रिपोर्ट पर भारत सरकार द्वारा कोई प्रतिक्रिया नहीं दी गई है। लेकिन पिछली बार भी भारत सरकार द्वारा इस प्रकार की रिपोर्ट को पूर्वाग्रहों पर आधारित बताया था। तब इस बात पर भी जोर रहा था कि विदेशी संस्थाओं को भारत के मामलों पर हस्तक्षेप करने का कोई अधिकार नहीं है।