असम में उल्फा का वार्ता समर्थक गुट और वार्ता विरोधी गुट फिर से बाहरी लोगों के खिलाफ आंदोलन खड़ा करने की कोशिश में है। 22 अगस्त की नगांव की घटना के बाद राज्य में जो प्रदर्शन हुए और इन प्रदर्शनों के दौरान जो नारेबाजी हुई वह इस बात की ओर स्पष्ट रूप से इशारा करती है। प्रदर्शनों के दौरान उल्फा के वार्ता समर्थक गुट के नेताओं ने जिस तरह के भड़काऊ बयान दिए उससे साफ है कि राज्य में उसी तरह का माहौल बनाने की कोशिश की जा रही है जैसा 1979 से 85 के दौरान था।

हालिया प्रदर्शन वैसे ही थे जैसे ऑल असम स्टूडेंटस यूनियन के आंदोलन के शुरुआती चरण में थे जब गैर असमिया, बाहरी व बांग्लादेशी घुसपैठियों का मुद्दा उठाया गया था। वार्ता विरोधी उल्फा गुट की ओर से बुलाए गए 12 घंटे के बंद का मोरीगांव और मोरान में व्यापक असर देखा गया था। एंटी आउटसाइडर आंदोलन के दौरान मशाल जुलूस निकाला गया और पूरी ब्रह्मपुत्र वैली में राजमार्ग को जाम किया गया। ज्यादातर प्रदर्शनों का आयोजन उल्फा के वार्ता विरोधी गुट ने किया था। इसमें ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन की लोकलाइज्ड यूनिट्स, असोम जातियाबादी युवा छात्र परिषद, ऑल ताई अहोम स्टूडेंट्स यूनियन और कृषक मुक्ति संग्राम समिति ने विरोध प्रदर्शनों में हिस्सा लिया था। कुछ जगहों पर प्रदर्शनकारियों ने कथित रूप से उल्फा के वार्ता विरोधी गुट के नेता परेश बरुआ के नाम के नारे लगाए।

असम में पिछले दो सप्ताह के दौरान जो प्रदर्शन हुए वे 22 अगस्त को नगांव में पूर्व उल्फा सदस्यों पर हुए हमले का परिणाम है। घटना एक व्यापारिक प्रतिष्ठान में हुई थी जब बंगाली भाषी परिवार के दो सदस्यों ने हमला किया था। उल्फा सदस्यों का समूह जब बाढ़ पीडि़तों के नाम पर  पैसे वसूलने गया था तो उन्हें कथित रूप से कमरे में बंद कर दिया गया और उनकी पिटाई कर दी। असम के मुख्यमंत्री सर्वानंद सोनोवाल ने कहा कि नगांव में हुई हालिया अप्रिय वारदातों से मैं बहुत दुखी हूं। उकसावे का सामना करने के लिए मैं राज्य के लोगों से शांति और सोहार्द बनाए रखने की अपील करता हूं। नगांव में उल्फा के चेयरमैन अरबिंदा राजखोवा ने कहा था, अगर असम के इंडिजनस लोगों पर हमले नहीं रुके तो खून खराबा होगा। इस तरह की घटना के बाद भी हम अपने लड़कों को कंट्रोल में रखने की कोशिश कर रहे हैं। हमारी बंदूकें हमारे बक्सों में बंद पड़ी है। हमें उन्हें बाहर निकालने के लिए मजबूर ना करें।

असम के डीजीपी मुकेश सहाय ने समाचार पत्र इंडियन एक्सप्रेस से कहा, उनमें से कुछ खतरनाक बयान दे रहे हैं और वे अपने लड़कों को फिर से संगठित कर और अपने बंदूकें बाहर निकालने की धमकी देकर कानून अपने हाथ में ले रहे हैं। शुरुआत में हमने सोचा कि यह क्षणिक आवेग है लेकिन उनमें से कुछ लगातार ऐसे बयान दे रहे हैं और अपने लड़कों को परेश बरुआ के नाम पर नारे लगाने के लिए प्रोत्साहित कर रहे हैं। उल्फा के वार्ता समर्थक गुट के नेतृत्व जितेन दत्ता ने खतरनाक 28 वीं बटालियन बनाई थी, जिसने 2008 में एकतरफा संघर्ष विराम की घोषणा की थी, ने कहा, अगर जरुरत हुई तो वह उल्फा के कैडर को फिर से संगठित करेंगे।

हमले के एक दिन बाद रैली में दत्ता ने कहा, हमें पता है कि कैसे जिया जाता है और कैसे जाने ली जाती है। अगर ऐसी घटनाएं लगातार जारी रही तो मुझे 10 हजार युवाओं के साथ हथियार के रास्ते पर वापस जाना होगा। अनूप चेतिया ने भाजपा पर आरोप लगाते हुए कहा था कि बांग्लादेशी और अन्य गैर असमिया लोग हमारे लोगों पर हमले के लिए उत्साहित हो रहे हैं क्योंकि सत्तारुढ़ पार्टी इंडिजनस समुदायों की पहचान और अस्तित्व को कुचल कर सिंगल इंडियन आइडेंटिटी के एजेंडे को शेप देने की कोशिश कर रही है।

असम के डीजीपी मुकेश सहाय ने कहा है कि जितेन दत्ता के खिलाफ आईपीसी की धारा 121 के तहत कुछ मामले दर्ज किए गए हैं। असम पुलिस ने सभी पुलिस अधीक्षकों को खतरनाक, भड़काऊ और देश विरोधी मामलों में स्वत:संज्ञान लेकर केस दर्ज करने को कहा है। बकौल सहाय, नगांव की घटना में शामिल सभी लोगों को गिरफ्तार किया गया है। वार्ता समर्थक उल्फा गुट के कुछ नेता लोगों के एक वर्ग के खिलाफ  स्थिति का निर्माण करने की कोशिश कर रहे हैं, जिन्हें वे आउटसाइडर्स बताते हैं।

दत्ता ने कहा कि वह सिर्फ बांग्लादेशियों के खिलाफ है जो 1971 के बाद असम में आए। बकौल दत्ता, असम समझौता स्पष्ट रूप से उन बांग्लादेशियों को वापस भेजने की बात करता है जो 1971 के बाद असम में घुसे हैं। भाजपा सरकार इससे इनकार करने की कोशिश कर रही है और उस देश के अल्पसंख्यकों की सुरक्षा के नाम पर ज्यादा बांग्लादेशियों को राज्य में सैटल कर रही है। अगर इसके खिलाफ प्रदर्शन करना भारत के खिलाफ जंग है जो मैं लगातार प्रदर्शन करूंगा।