उल्फा के कमांडर इन चीफ और वाइस चेयरमैन परेश बरुआ ने बताया कि बीस सालों बाद म्यांमार की सेना ने नगा स्वशासित क्षेत्र सजाइंग में पूर्वोत्तर के विद्रोही गुटों पर हमले कर रही है। म्यांमार की विदेश सेवा के कमांडर-इन-चीफ की ऑफिस से भी इस तरह की प्रेस रिलीज जारी हुई है, जिसमें कहा गया है कि सेना ने पूर्वोत्तर के विद्रोहियों के हथियार व आउटपोस्ट कैप्चर कर लिए हैं।

इससे पहले जारी की गई एक रिलीज में कहा गया कि सेना ने टकर गांव के दो आउटपोस्ट और दो ट्रेनिंग स्कूल को कैप्चर कर लिया है। यह ऑपरेशन चार दिन तक चला था। बाद में कहा गया कि यह ऑपरेशन इसलिए चलाया गया ताकि अवैध रूप से विद्रोही  गुटों के लोगों को फैलने से रोका जा सके। इस पर बरुआ ने कहा, यह हमारे लिए सामान्य बात है। इसमें नया कुछ भी नहीं है। हम इस तरह के हमले और ऑपरेशन के लिए हमेशा तैयार रहते हैं। किसी गैर जानकारी वाली जगह से फोन पर बात करते हुए बरुआ ने कहा, भारत सरकार द्वारा दबाव के कारण म्यांमार की सरकार ने ये ऑपरेशन हमारे खिलाफ किया है।हमारे खिलाफ ऑपरेशन चलाने के लिए भारत सरकार ने ही म्यांमार को इतने हथियार दिए हैं।

म्यांमार की सेना अब तक नेशनल सोशलिस्ट काउंसिल ऑफ नागालैंड के छह विद्रोहियों को गिरफ्तार कर चुकी है, जिसमें 11 छोटे हथियार और 15 एके सीरीज के राइफल मिले हैं। बरुआ ने कहा, यह भारत सरकार की योजना थी क्योंकि हम नागरिकता संशोधन विधेयक का विरोध कर रहे थे, लेकिन वे कुछ नहीं कर सके क्योंकि हमारे कैंप स्थाई तौर पर नहीं होते बल्कि हम अपने कैंप को शिफ्ट करते रहते हैं।इसलिए म्यांमार की सेना के ऑपरेशन के पहले हम वहां से जा चुके थे।

बता दें कि भारत सरकार ने 1990 से ही उल्फा को आतंकवादी संगठन के रूप में बैन कर रखा है। दिसंबर 2003 में उल्फा को उस समय बड़ा झटका लगा जब रॉयल आर्मी ऑफ भूटान ने उनके विद्रोही गुट पर हमला बोला था। इसके बाद बांग्लादेश ने भी उल्फा के खिलाफ ऑपरेशन किया। इन वजहों से जनवरी 2010 में उल्फा ने अपना रुख कुछ नरम कर लिया और सरकार से बातचीत के लिए तैयार हो गया। सितंबर 2011 में अरबिंद राजखोवा की अगुवाई वाली उल्फा, भारत सरकार और असम सरकार के बीच एक समझौता हुआ, जिसके तहत उल्फा के खिलाफ भारत सरकार उल्फा के खिलाफ ऑपरेशन रोकने को तैयार हो गई, लेकिन बाद के सालों में परेश बरुआ ने बातचीत करने से इनकार कर दिया।