रूस और यूक्रेन के बीच का संकट युद्ध अब भीषण हो गया है। इस मोड़ पर रूस के पीछे हटने की भी कोई ठोस वजह नहीं दिखाई दे रही है। वहीं, दूसरी तरफ यूक्रेन के राष्‍ट्रपति व्‍लोदोमीर जेलेंस्‍की का दुख भी अब दुनिया के सामने छलक आया है। 

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जिस तरह से वो इस लड़ाई में अकेले पड़ गए हैं और रूस का सामना कर रहे हैं उसको देखते हुए उनकी लाचारी भी साफतौर पर देखी जा सकती है। जेलेंस्‍की की इस लाचारी को तब भी महसूस किया गया था जब उन्‍होंने रूस के राष्‍ट्रपति व्‍लादिमीर पुतिन को फोन किया था और बदले में उन्‍हें कोई रेस्‍पांस नहीं मिला। उनके मुंह से निकली इस बात ने उस दर्द और उस डर को भी उजागर कर दिया जो अब तक दुनिया से छिपा हुआ था।

राष्‍ट्रपति जेलेंस्‍की ने बताया उनकी फोन काल का क्रेमलिन की तरफ से कोई जवाब नहीं मिला। उन्‍होंने यहां तक कहा कि उन्‍हें इस जंग में अकेला छोड़ दिया गया है। उनका इशारा साफतौर पर अमेरिका की ही तरफ था, जो अब तक नाटो को उनकी सहायता के लिए भेजने की बात कर रहा था। हालांकि उन्‍होंने अमेरिका का सीधेतौर पर नाम नहीं लिया लेकिन उनके बयान से ये भी स्‍पष्‍ट हो गया कि अमेरिका ने उन्‍हें धोखा दे दिया है। 

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अमेरिका ने इस लड़ाई के लिए यूक्रेन हथियारों के तौर पर मदद देने की बात कही थी और दिए भी। लेकिन सच्‍चाई ये है कि यूक्रेन को रूस का सामना करने के लिए जिस ताकत की जरूरत थी वो उसको अमेरिका की तरफ से नहीं मिली। जानकारों ने इस बात का अंदेशा पहले ही जता दिया था कि नाटो जिसपर अमेरिका का वर्चस्‍व है और जिसमें तीस देश शामिल हैं, उनके हित रूस के साथ जुड़े हैं। ऐसे में नाटो का यूक्रेन को समर्थन मिलना काफी मुश्किल होगा।

राष्‍ट्रपति लेंस्‍की की ही बात करें तो उन्‍होंने एपी से बातचीत के दौरान ये भी कहा कि वो पुतिन से बात करना चाहते हैं। साथ ही ये भी आशंका जताई कि वो उनकी बात अब मानने वाले नहीं है। उनके इस बयान में भी डर और दर्द को साफतौर पर देखा जा सकता है। ये कहना गलत नहीं होगा कि अमेरिका पर विश्‍वास कर उन्‍होंने एक बड़ी भूल की है। मौजूदा परिस्थितियों में सुरक्षा परिषद से लेकर दूसरे देश केवल रूस को शांति के साथ इसका समाधान तलाश करने की बात कर रहे हैं। भारत ने भी रूस से इस मसले का हल शांतिपूर्ण तरीके से निकालने की अपील की है। फ्रांस, इटली, ब्रिटेन और जर्मनी भी यहीं कर चुके हैं।