केंद्रीय मंत्रिमंडल के विस्तार के बाद बीजेपी अब अपने शीर्ष संगठनात्मक ढांचे में खाली पड़े कुछ महत्वपूर्ण पदों को भरने की कोशिश में जुट गई है. सूत्रों ने बताया कि बीजेपी की संसदीय बोर्ड में उपाध्यक्ष, महासचिव और चार पदों पर जल्द ही नियुक्ति होने की संभावना है.

सूत्रों के मुताबिक, बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा इन शीर्ष पदों के लिए कई नेताओं की परफॉर्मेंस की समीक्षा कर रहे हैं. इन पदों पर जल्दी नियुक्ति करना महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि बीजेपी उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब, हिमाचल प्रदेश, गुजरात, गोवा और मणिपुर में अगले साल होने वाले विधानसभा चुनावों की तैयारी कर रही है.

केंद्रीय मंत्रिपरिषद में अपना जगह बचाए रख पाने में विफल रहने वाले रविशंकर प्रसाद, प्रकाश जावड़ेकर, डॉ हर्षवर्धन और अन्य नेताओं में से कुछ को इन खाली पदों पर नियुक्त किया जा सकता है. अपने समुदाय, क्षेत्र और अन्य पहलुओं की उपयुक्तता के आधार पर भी कई नेताओं को इन संगठनात्मक पदों पर समायोजित किए जाने की संभावना है.

हालांकि, पार्टी के सूत्रों ने कहा कि इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि जिन लोगों को मंत्री पद से हटा दिया गया है, उन्हें इन पदों पर रखा जाएगा. गौरतलब है कि भूपेंद्र यादव को मंत्री के पद पर पदोन्नत किए जाने के बाद महासचिव का पद खाली हो गया है, जिसे भरा जाना है. सूत्रों ने बताया कि भारतीय जनता पार्टी के संसदीय बोर्ड में कम से कम चार सीटें खाली पड़ी हैं. पार्टी के संविधान के मुताबिक, राष्ट्रीय कार्यकारिणी एक संसदीय बोर्ड का गठन करेगी, जिसमें पार्टी अध्यक्ष और 10 सदस्य होंगे और इनमें से एक संसद में पार्टी का नेता होगा और पार्टी अध्यक्ष इसके चेयरमैन होंगे.

बीजेपी प्रमुख जगत प्रकाश नड्डा के अलावा, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, अमित शाह, राजनाथ सिंह, नितिन गडकरी, शिवराज सिंह चौहान और बीएल संतोष सहित अन्य वरिष्ठ नेताओं को पार्टी की वेबसाइट पर संसदीय बोर्ड के सदस्यों के रूप में सूचीबद्ध किया गया है. संसदीय बोर्ड में चार पद खाली हैं. संसदीय बोर्ड बीजेपी की डिसीजन मेकिंग बॉडी है. यह बोर्ड चुनावी और पार्टी की रणनीति को अंतिम रूप देता है और टिकटों के वितरण में भी इसकी अहम और अंतिम भूमिका होती है.

सूत्रों के मुताबिक, बीजेपी संसदीय बोर्ड में फेरबदल में भी क्षेत्रीय संतुलन और खासकर चुनावी राज्यों का ध्यान रखा जाएगा. जिस तरह कैबिनेट विस्तार में कुछ राज्यों में होने वाले चुनाव को ध्यान में रखकर फैसला लिया गया है, वैसे ही संगठन में भी फेरबदल करते समय इन्हीं बात को प्रमुखता दी जाएगी. पार्टी सूत्रों का कहना है कि कुछ वरिष्ठ नेताओं के अनुभवों का फायदा अगले 3-4 महीने में होने वाले राज्यपालों की नियुक्ति में उठाया जाएगा. गौरतलब है कि इस साल अक्टूबर तक करीब आधे दर्जन राज्यपाल रिटायर्ड होने वाले हैं.