नई दिल्ली। चुनाव की तारीख के एलान के साथ ही त्रिपुरा विधानसभा चुनाव में भाजपा और माकपा के बीच सीधी लड़ाई का बिगुल बज गया है। पूर्ण राज्य का दर्जा पाने के 45 सालों में से 35 सालों तक त्रिपुरा में काबिज रहे माकपा के लिए इस बार नई स्थिति है- लड़ाई सीधे तौर पर भाजपा से है। 

भाजपा ने माकपा के आदिवासी विरोधी छवि की कमजोरी को पकड़ा और इसे अपनी सबसे बड़ी ताकत बना ली। आदिवासियों के अंतिम राजा का 71 साल बाद पहली बार पूरे त्रिपुरा में जन्मदिन मनाना हो या फिर अगरतला हवाईअड्डे का नाम अंतिम राजा के नाम पर करने की। 

आदिवासियों से जुड़े मुद्दे उठाकर भाजपा उनके बीच पैठ बनाने में सफल रही। हालात यह हो गया है कि आदिवासियों के लिए अलग राज्य की मांग करने वाली आइपीएफटी को अपनी मांग छोड़कर भाजपा के साथ गठबंधन करने का ऐलान करना पड़ गया। इसी तरह तीन अन्य छोटे-छोटे आदिवासी दलों से भी गठबंधन की बातचीत अंतिम दौर में है। त्रिपुरा में 20 सीटें आदिवासियों के लिए आरक्षित हैं, जबकि 20 अन्य सीटों पर उसके वोट निर्णायक साबित होते हैं।

इसके अलावा उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भाजपा के लिए यहां तुरूप का इक्का साबित हो सकते हैं। योगी आदित्यनाथ के नाथ संप्रदाय को मानने वाले त्रिपुरा की आबादी का एक-तिहाई हैं। देखना यह है कि तमाम समीकरणों को अपने पक्ष में करती दिख रही भाजपा वामपंथ की धरती पर कमल खिलाने में कामयाब हो पाती है या नहीं।