त्रिपुरा में भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) 35 साल बाद पूर्ण बहुमत के साथ सरकार बनाएगी। जिस भाजपा पर त्रिपुरा में जमानत जब्त पार्टी का ठप्पा लग चुका था, उसे मिली बंपर जीत किसी भी चमत्कार से कम नहीं हैं। त्रिपुरा में जिस तरह से लेफ्ट फ्रंट की हार हुई है उससे स्पष्ट है कि वहां भगवा आंधी चली है और इस आंधी में जिस त्रिपुरा को वामपंथियों का किला कहा जाता था वह अब ढह चुका है।

भाजपा ने लेफ्ट फ्रंट का सूपड़ा साफ कर दिया है, जिसकी किसी को उम्मीद नहीं थी। हां सभी को यह जरूर पता था कि भाजपा इस बार लेफ्ट फ्रंट को कड़ी टक्कर दे रही है।

मुख्यमंत्री माणिक सरकार खुद इस बात को कबूल कर चुके थे कि उनका मुकाबला भाजपा से है। यहां तक कि जो एग्जिट पोल आए थे उनमें भी भाजपा की इतनी जबरदस्त जीत की भविष्यवाणी नहीं की गई थी।

त्रिपुरा में लेफ्ट के किले को ढहाने के कई कारण हैं। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने त्रिपुरा में सबसे पहले युवा नेता बिप्लव कुमार देब को प्रदेश की कमान सौंपी थी, जो कभी सांसद गणेश सिंह के पीए थे।

उसके बाद संगठन से जुड़े और मोदी के वाराणसी संसदीय सीट के प्रभारी रहे सुनील देवधर को त्रिपुरा का प्रभारी बनाया। फिर अमित शाह ने यूपी चुनाव की तर्ज पर त्रिपुरा में बूथ और पन्ना प्रमुख की रणनीति को कारगार ढंग से लागू किया।


त्रिपुरा प्रभारी सुनील देवधन ने कहा कि वाम काडर कोई मामूली काडर नहीं हैं। फर उसकी एक कमजोरी है कि सत्ता में आते ही प्रशासन का राजनीतिकरण और राजनीति का अपराधीकरण में लग जाता है, जिससे बूथ स्तर का काडर भी पार्टी पर निर्भर हो जाता है और सरकार की योजना में लाभ उठाने लगता है।

इसी वजह से बंगाल में वाम काडर खत्म हो गया था। बता दें कि भाजपा ने 2014 में त्रिपुरा में पहले मंडल स्तर पर मोर्चों का गठन किया, फिर बूथ कमेटियों का गठन शुरु हुआ।

राज्य के 3214 बूथों पर यूपी जैसी रणनीति अपनाई। हर बूथ पर भाजपा ने वन बूथ-टेन यूथ का फॉर्मला अपनाया। साथ ही हर बूथ पर 10-10 महिलाएं, एससी, एसटी, ओबीसी, अल्पसंख्यक और किसानों को भी जोड़ा। 2700 बूथों पर 10-10 महिलाओं की टीम तैयार की।

इसके अलावा, त्रिपुरा वोटर लिस्ट के कुल 48000 पन्नों में से 42000 पन्नों पर कार्यकर्ता तैनात किए। यानी एक पेज के 60 वोटर पर एक भाजपा कार्यकर्ता तैनात था।

जिसकी ड्यूटी हर हफ्ते में एक बार सभी वोटर से मिलकर तीन बिंदुओं पर बात करना था। इसी तरह त्रिपुरा में भाजपा ने क्षेत्रीय दल आईपीएफटी से गठबंधन कर 20 आरक्षित आदिवासी सीटों पर कब्जा किया।