भाजपा-आईपीएफटी गठबंधन ने लेफ्ट का किला ध्वस्त कर दिया। 25 साल से सत्ता पर काबिज लेफ्ट फ्रंट का एक तरह से सूपड़ा साफ हो गया। विधानसभा चुनाव में लेफ्ट फ्रंट को सिर्फ 16 सीटें मिली। पिछले विधानसभा चुनाव में लेफ्ट फ्रंट का वोट शेयर 59 फीसद था,जो 2018 में घटकर 42.7 फीसद रह गया है। सबसे बुरा हाल हुआ कांग्रेस का,जिसका खाता भी नहीं खुला।

कांग्रेस ने 59 सीटों पर उम्मीदवार खड़े किए थे, सभी की जमानत जब्त हो गई। त्रिपुरा की कुल आबादी करीब 37 लाख है। इनमें से 25.6 लाख वोटर हैं। 2013 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के 10 उम्मीदवार चुन कर आए थे। 2018 आते आते इनमें से 8 पार्टी छोड़कर दूसरे दलों में शामिल हो गए। 7 भाजपा में चले गए जबकि एक सीपीएम में शामिल हो गया। पिछले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने नेशनलिस्ट पार्टी ऑफ त्रिपुरा (आईएनपीटी) के साथ गठबंधन किया था। कांग्रेस ने 48 सीटों पर चुनाव लड़ा था जबकि उसकी सहयोगी आईएनपीटी ने 12 सीटों पर। 48 सीटों पर कांग्रेस का वोट शेयर 36.53 फीसदी रहा जबकि 12 सीटों पर आईएनपीटी का वोट शेयर 7.59 फीसदी था।

इस बार कांग्रेस का 59 सीटों पर वोट शेयर सिर्फ 2 फीसदी रहा। साफ है कि कांग्रेस राज्य में बहुत कमजोर हुई है जिसका भाजपा ने लाभ उठाया। असल में कांग्रेस ने इस बार सिर्फ लडऩे के लिए चुनाव लड़ा था। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी वोटिंग से दो दिन पहले 16 फरवरी को चुनाव प्रचार करने पहुंचे थे। आपको बता दें कि इस बार भाजपा का वोट शेयर 43 फीसदी रहा। पिछले विधानसभा चुनाव में भाजपा ने 50 सीटों पर उम्मीदवार खड़े किए थे। एक भी उम्मीदवार नहीं जीत पाया था। 50 में से 49 की तो जमानत जब्त हो गई थी।

2013 के विधानसभा चुनाव में भाजपा का वोट शेयर सिर्फ 1.54 फीसदी था। भाजपा को पूरे राज्य में सिर्फ 33,808 वोट मिले थे। भाजपा रिवोल्यूशनरी सोशलिस्ट पार्टी, जो लेफ्ट की सहयोगी है उससे भी पीछे रह गई थी। रिवोल्यूशनरी सोशलिस्ट पार्टी को  1.95 फीसदी वोट मिले थे। आरएसपी ने दो सीटों पर चुनाव लड़ा था। दोनों सीटें हार गई थी। 2014 के लोकसभा चुनाव में जब प्रधानमंत्री अगरतला के अस्तबल ग्राउंड में रैली को संबोधित करने पहुंचे थे तब 7 हजार से भी कम लोग जुटे थे जबकि ग्राउंड की क्षमता 40 हजार की है। इस बार भाजपा ने चुनाव से पहले आईपीएफटी से गठबंधन किया।

भाजपा ने 51 सीटों पर उम्मीदवार उतारे, 9 पर आईपीएफटी ने चुनाव लड़ा। भाजपा को 35 जबकि आईपीएफटी को 8 सीटें मिली। माणिक सरकार ने चुनाव से पहले कहा था कि भाजपा अपनी विचारधारा या किसी कार्यक्रम की वजह से नहीं बल्कि कांग्रेस का जनाधार सिकुडऩे के कारण मजबूत हुई है। भाजपा के मजबूत होने की एक वजह आरएसएस भी है। आरएसएस पिछले 35-40 साल से त्रिपुरा में काम कर रहा है,खासतौर पर जनजातीय इलाकों में। वाजपेयी के समय में भी (1998-2004) भाजपा ने त्रिपुरा में अपने आधार के विस्तार की कोशिश की थी। उन्हें कुछ ग्राउंड मिला भी था।