त्रिपुरा में लेफ्ट फ्रंट को बड़ा झटका लगा है। यहां 25 साल से लगातार राज करने वाली लेफ्ट फ्रंट आज हाशिए पर आ गई है। उसे भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने करारी मात दी है। 2018 के विधानसभा चुनाव में भगवा लहर में लेफ्ट फ्रंट का सबसे मजबूत किला ढह गया है। इस चुनाव में उसे महज 16 सीटें ही मिली हैं। वहीं बीजेपी गठबंधन (यहां बीजेपी ने आईपीएफटी के साथ गठबंधन किया है) ने 43 सीटें जीतकर पूर्ण बहुमत हासिल कर लिया है। त्रिपुरा में 41 साल बाद लेफ्ट फ्रंट का इतना बुरा हाल हुआ है।


त्रिपुरा में अभी तक कुल दस बार विधानसभा चुनाव हो चुके हैं। शुरुआत के दो विधानसभा चुनाव (1967-1973) और 1988 को छोड़ दिया जाए तो त्रिपुरा में सात बार सीपीएम की सरकार रही है, लेकिन इस बार उनके हाथ से सत्ता छिन गई है। 1967 में हुए चुनाव में सीपीएम को महज दो सीटें ही मिली थी। इस वक्त यहां कांग्रेस ने 27 सीटों के साथ सरकार बनाई थी। 1972 में भी कांग्रेस ने 41 सीटों से साथ पूर्ण बहुमत पाया था। सीपीएम को महज 16 सीटें मिली थीं। हालांकि 1977 में सीपीएम ने जोरदार वापसी करते हुए 51 सीटें जीतीं और पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता में अपनी जगह बनाई।


1983 में भी सीपीएम ने 37 सीटें जीतकर सत्ता का सुख उठाया। हालांकि 1988 में त्रिपुरा के समीकरण बदल गए। यहां कांग्रेस ने सिर्फ 25 सीट जीतकर गठबंधन की सरकार बना दी। 1993 में सीपीएम ने जोरदार वापसी करते हुए 44 सीटों पर अपना कब्जा जमाया। इसके बाद से सीपीएम 2013, लगातार पांच बार त्रिपुरा में अपनी सरकार बनाती रही । 1998 में सीपीएम को 38, 2003 में भी 38, 2008 में 46 और 2013 में 49 सीटें जीतकर बहुमत से सरकार बनाई।

त्रिपुरा में 25 साल बाद लेफ्ट के किले को ढहाते हुए बीजेपी ने पहली बार सत्ता हासिल कर ली है। बांग्लाभाषी लोगों की बहुलता वाले इस राज्य में 1993 के बाद से ही सीपीएम की सत्ता थीए लेकिन पश्चिम बंगाल के बाद अब यह किला छिनना भी लेफ्ट के लिए चिंता की बात है। कभी उत्तर और पश्चिम भारत की ही पार्टी कही जाने वाली बीजेपी का पूर्वोत्तर के राज्यों में इतनी बड़ी बढ़त हासिल करना उसके लिए भी चौंकाने वाला है। बता दें कि असम में पूर्वोत्तर की अपनी पहली सरकार बनाने वाली बीजेपी के बारे में तीन साल पहले कोई यह नहीं कह सकता था कि वह त्रिपुरा में भी अपना परचम लहराएगी। त्रिपुरा में 2013 में 1.5 फीसदी वोट हासिल करने और अपना खाता भी न खोल पाने वाली बीजेपी ने इस बार सभी को चौंका दिया है।

गौरतलब है कि कि पिछले 25 साल से सीपीएम के गढ रहे त्रिपुरा में भाजपा के उम्मीदवारों को जमानत बचाने के लाले पड़ जाते थे। 2013 के चुनाव में भाजपा ने 50 उम्मीदवार मैदान में उतारे, जिनमें से 49 की जमानत जब्त हो गई। 2008 में भी पार्टी के 49 उम्मीदवारों की जमानत जब्त हुई थी। इसी तरह 2003 में भाजपा के 21 उम्मीदवार अपनी जमानत नहीं बचा सके थे। 1998 में पार्टी ने पहली बार राज्य की सारी 60 सीटों पर चुनाव लड़ा, लेकिन पार्टी के 58 उम्मीदवारों की जमानत जब्त हो गई। वहीं 1993 में 36, 1988 में 10 और 1983 में चार उम्मीदवारों की जमानत जप्त हो चुकी थी।