देश के सबसे छोटे प्रदेशों में शामिल त्रिपुरा में बीजेपी ने इतिहास रच दिया है। 35 साल बाद भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने लेफ्ट फ्रंट के किले में सेंध लगाई है। यहां बीजेपी की बहुमत के साथ सरकार बनती नजर आ रही है। हालांकि बीजेपी के लिए ये इतना आसान नहीं था। पिछले चुनाव में बीजेपी ने त्रिपुरा विधानसभा चुनाव में 50 उम्मीदवारों को खड़ा किया था, जिसमें 49 की जमानत तक जप्त हो चुकीBJP  के तीन चाणक्य, जिनकी बदौलत त्रिपुरा में रचा इतिहास है, लेकिन बीजेपी को त्रिपुरा की मुख्य धारा में लाने और लेफ्ट के सामने खड़ा करने में तीन राजनेताओं की अहम भूमिका रही। ये हैं सुनील देवधर, राम माधव और हिमंता विश्व शर्मा। आपको इन तीनों धुरंधरों से रूबरू करवाते हैं।



सुनील देवधर
सुनील देवधर का जन्म महाराष्ट्र में हुआ था। हालांकि इन्होंने कभी चुनाव तो नहीं लड़ा, लेकिन चुनाव के दौरान बीजेपी के लिए महत्ती भूमिका निभाई। बता दें कि वर्ष 2013 में विधान सभा के चुनावों में माक्र्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी को 49 सीटें आयीं थीं, जबकि भारत की कम्युनिस्ट पार्टी यानी सीपीआई को एक, दस सीटों से साथ त्रिपुरा में कांग्रेस पार्टी मुख्य विपक्षी दल ही रहा। मगर इस बार भारतीय जनता पार्टी वाम दलों को टक्कर देने की स्थिति में अगर आई है तो इसके पीछे सुनील देवधर की भी बड़ी भूमिका है, जिन्होंने एक एक बूथ स्तर पर संगठन खड़ा करना शुरू किया।

बता दें कि त्रिपुरा से पहले पूर्वोत्तर भारत के मेघालय में भी सुनील देवधर ने संगठन का विस्तार किया। लोक सभा के चुनावों के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी वाराणसी से लड़े थे और सुनील देवधर ने वहां भी उनके चुनाव और संगठन की कमान संभाली थी। पूर्वोत्तर भारत में काम करते करते राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक रहे सुनील देवधर ने स्थानीय भाषाएं सीख लीं। जब वो मेघालय के खासी और गारो जनजाति के लोगों से उन्हीं की भाषा में बात करने लगे तो लोग हैरान हो गए। उसी तरह वो फर्राटे से बंगला भाषा भी बोलते हैं। कहते हैं कि त्रिपुरा में वाम दलों, कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस में सेंध मारने का काम भी उन्होंने ही किया है। विधानसभा के चुनावों से ठीक पहले इन दलों के कई नेता और विधायक भाजपा में शामिल हो गए।


हिमंता बिश्व शर्मा

पूर्वोत्तर भारत में बहुत कम समय में ही भाजपा का डंका बज गया है। इसके पीछे हिमंता बिश्व शर्मा अपनी अहम भूमिका निभा रहे हैं। हिमंता असम में कांग्रेस के सबसे कद्दावर नेता और पूर्व मुख्यमंत्री तरुण गोगोई का दाहिना हाथ माने जाते थे। ऐसे में भाजपा ने इनकी राजनीतिक उपयोगिता को समझ कर इन्हें अपने पाले में करने का काम शुरु किया। हिमंता का साथ मिलते ही बीजेपी मिशन नॉर्थईस्ट में पूरी तरह से जुट गई। हिमंता के दम पर भारतीय जनता पार्टी ने असम में बहुमत हासिल कर पूर्वोत्तर भारत में अपने पांव जमाने का काम किया भाजपा ने इन्हें पूर्वोत्तर भारत प्रजातांत्रिक गठबंधन का संयोजक भी बना दिया है। कहते हैं कि हिमंता को कांग्रेस की कमजोरियां और ताकत, दोनों का अंदाजा था और उनको पार्टी में शामिल कर भाजपा ने कांग्रेस को सांगठनिक रूप से कमजोर करना शुरू कर दिया। 

हिमंता कांग्रेस पार्टी के कुछ नेताओं से नाराज चल रहे थे और उसका फायदा उठाकर भाजपा ने उन्हें पूर्वोत्तर भारत में अपने तुरुप का इक्का बनाया। उपरी असम के जोरहट में जन्मे हेमंत बिस्वा सरमा मौजूदा असम सरकार में वित्त मंत्री तो हैं ही, उन्हें भारतीय जनता पार्टी ने पूर्वोत्तर भारत प्रजातांत्रिक गठबंधन का संयोजक भी बनाया है। पूरे पूर्वोत्तर भारत में कांग्रेस की शाख कमजोर करने का श्रेय भी हेमंत को ही जाता है। बता दें कि हिमंता बिश्व शर्मा का जन्म 1 फरवरी 1968 को असम के जोरहाट जिले में हुआ था।


राम माधव
पूर्वोत्तर में बीजेपी की पहुंच बनाने में एक शख्स का नाम काफी सुर्खियों में है। संघ में बाल स्वयंसेवक से शुरुआत करने वाला वह शख्स आज बीजेपी के सबसे महत्वपूर्ण रणनीतिकारों में से एक है। मूलत: आंध्र प्रदेश के रहने वाले राम माधव 2014 में संघ से बीजेपी की सक्रिय राजनीति में बड़ी खामोशी से आए थे। 2003 में आरएसएस ने उन्हें अपना प्रवक्ता बनाया था। प्रवक्ता रहने के दौरान वह आरएसएस के रुख को बड़ी सक्रियता से मीडिया में रखते थे। राम माधव को प्रधानमंत्री मोदी का अमित शाह की तरह ही विश्वासपात्र माना जाता है। मोदी की हर विदेश यात्र में राम माधव की रणनीति होती होती है। बीजेपी ने राम माधव को महासचिव बनाया।



पार्टी ने उन्हें असम की जिम्मेदारी दी और असम में तरुण गोगोई का किला ध्वस्त करने में वह कामयाब रहे। असम में न केवल बीजेपी की सरकार बनी बल्कि पार्टी कांग्रेस के संगठन को भी तोडऩे में कामयाब मिली। हिमंता बिश्व शर्मा जैसे कांग्रेस के अहम नेता को राम माधव ने अपने पाले में किया। पार्टी ने राम माधव को एक और सरहदी राज्य जम्मू-कश्मीर की जिम्मेदारी दी। वहां राम माधव ने सज्जाद लोन जैसे अलगाववादी नेता को चुनावी मैदान में उतारा। वहां भी पार्टी ने बढिय़ा प्रदर्शन किया और पीडीपी के साथ मिलकर सरकार बनाई। यहां बीजेपी का उपमुख्यमंत्री है, जिन राज्यों में बीजेपी सफलता हासिल कर रही थी वे पार्टी के लिए बड़े मुश्किल राज्य थे। आंध्र प्रदेश में जन्मे राम माधव ने कई पुस्तकें तो लिखीं साथ ही वो पूर्वोत्तर भारत में संगठन की देखरेख भी करने लगे। नागा गुटों से समझौते में भी राम माधव की बड़ी भूमिका बतायी जा रही है। अपने संगठन के विस्तार पर चर्चा करते हुए राम माधव कहते हैं कि पिछले पांच सालों से भाजपा ने इस इलाके के राजनीतिक दांव पेंचों को सही तरह समझना शुरू किया। वो कहते हैं कि असम को छोड़ कर पूर्वोत्तर भारत में भाजपा का कोई जनाधार नहीं था। असम से ही पूर्वोत्तर के अन्य राज्यों में संगठन का संचालन होता था।