पूर्वोत्तर के राज्य त्रिपुरा के नतीजों ने देश के सियासी नक्शे को बदला दिया । त्रिपुरा में बीजेपी गठबंधन भारी बहुमत के साथ सत्ता में पहुंची है, वहीं लेफ्ट फ्रंट के सबसे मजबूत किले को ढहा दिया है। त्रिपुरा में बीते 25 साल से लगातार लेफ्ट फ्रंट का ही राज रहा है।

देश में ऐसा पहली बार हुआ है जब बीजेपी ने लेफ्ट की मजबूत पकड़ वाले राज्य में उसे सत्ता से बाहर कर दिया। पिछले विधानसभा चुनाव (2013) में जहां बीजेपी अपना खाता भी नहीं खोल पाई थी, वहीं इस चुनाव में 40 सीटें जीत ली हैं। वहीं सीपीएम महज 19 सीटों पर सिमटती हुई दिख रही है। कांग्रेस इस चुनाव में अपना खाता भी नहीं खोल पाई है। वहीं किसी भी सीट से निर्दलीय उम्मीदवारों ने बाजी नहीं मारी है।


त्रिपुरा के शुरुआती रुझान में बीजेपी गठबंधन (यानी बीजेपी और इंडिजीनियस पीपुल्स फ्रंट ऑफ  त्रिपुरा) और लेफ्ट के बीच कांटे की टक्कर नजर आई। जिस त्रिपुरा में बीते 25 साल में बीजेपी का खाता तक नहीं खुला था, वहां उसने 51 सीटों पर माकपा को चुनौती दी थी। यहां पहली बार वह सबसे ज्यादा सीटें लेकर आ रही है। त्रिपुरा में 25 साल से लेफ्ट की सरकार है। माना जा रहा है कि उसे एंटी-इनकंबेंसी फैक्टर के चलते नुकसान हुआ है। यहां 59 सीट पर चुनाव हुआ। एक सीट पर उम्मीदवार का निधन होने की वजह से चुनाव नहीं हुआ। 2013 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने त्रिपुरा में 50 उम्मीदवार उतारे थे, जिनमें से 49 की जमानत जब्त हो गई थी, तब बीजेपी को यहां केवल 1.87 फीसदी वोट मिले थे और वो एक भी सीट नहीं जीत सकी थी। वहीं इस बार भाजपा को ऐतिहासिक रूप 40 प्रतिशत से ज्यादा वोट मिले। पिछले चुनाव में माकपा को 49 सीटें मिली थीं, जबकि कांग्रेस को 10 सीटों से संतोष करना पड़ा था।


बता दें कि त्रिपुरा में इस साल 91 फीसदी मतदान हुआ है। त्रिपुरा विधानसभा चुनाव में कुल 292 उम्मीदवार मैदान में थे।  हालांकि 60 विधानसभा वाले त्रिपुरा की 59 सीटों पर ही मतदान हुआ था। सीपीएम प्रत्याशी रामेंद्र नारायण के निधन के कारण चारीलाम विधानसभा सीट पर 12 मार्च को मतदान होगा। इस बार 23 महिलाओं सहित कुल 292 उम्मीदवार चुनाव मैदान में थे। कांग्रेस ने सभी सीटों पर अपने उम्मीदवारों को चुनाव मैदान में उतारा था। चुनाव प्रचार में इस बार भाजपा ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी थी। पिछले विधानसभा चुनाव (2013) की बता करें तो सीपीएम को 49, सीपीआई को 1 और कांग्रेस को 10 सीटें मिलीं थी। वहीं भाजपा अपना खाता भी नहीं खोल पाई थी।


गौरतलब है कि पिछले पांच विधानसभा चुनाव में लगातार जीत रही माकपा की सरकार का नेतृत्व चार बार से माणिक सरकार कर रहे थे। कांग्रेस को 1988 और 1993 के विधानसभा चुनाव में जीत हासिल हुई। कांग्रेस ने राज्य की 59 सीटों पर और भाजपा ने 51 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे थे। भाजपा ने शेष 9 सीटें सहयोगी दलों के उम्मीदवारों के लिये छोड़ दी थी, जबकि कांग्रेस ने काकराबोन सीट पर अपना उम्मीदवार नहीं उतारा। मतदान के आंकड़ों के मुताबिक इस बार राज्य के 25.73 लाख मतदाताओं ने मतदान में हिस्सा लिया था। बता दें कि माणिक सरकार देश के सबसे गरीब मुख्यमंत्री हैं। माणिक सरकार का पूरा जीवन बेदाब है। आज तक उन पर किसी तरह का आपराधिक मुकदमा दर्ज नहीं हुआ है। उनकी सादगी राजनीतिक दुनिया में करिश्माई ताकत दिखाती आयी हैं वे राज्य में बेहद ही लोकप्रिय हैं।

जानिए एग्जिट पोल के आंकड़े

वहीं पूर्वोत्तर के तीन राज्यों में विधानसभा चुनाव के बाद एक्जिट पोल में त्रिपुरा में भाजपा के कम्युनिस्ट  सरकार को सत्ता से बेदखल करने का अनुमान लगाया गया था। एग्जिट पोल्स ने बीजेपी को त्रिपुरा में 60 में से 35 से ज्यादा सीटें दी थी। वहीं एग्जिट पोल्स में  नगालैंड में भी बीजेपी को बड़ी बढ़त दिखी थी।

जन की बात-न्यूज एक्स के एग्जिट पोल ने बीजेपी और आईपीएफटी के गठजोड़ को 35 से 45 सीटें (51% वोट) दी थीं। वहीं सीपीएम के 14-23 के बीच सीटें दी थीं।  इस एग्जिट पोल में कांग्रेस अपना खाता भी नहीं खोल पा रही थी।  एक्सिस माई इंडिया के एग्जिट पोल में बीजेपी 44-50 सीटें और लेफ्ट को 9-10 सीटें दी थी।