मणिपुर में सक्रिय आठ विद्रोही समूहों को गैरकानूनी और हिंसक गतिविधियों में लगातार शामिल होने पर लगाए गए प्रतिबंधों को पांच सालों के लिए और बढ़ाने के मामले पर  फैसला लेने के लिए केंद्र सरकार ने एक न्यायाधिकरण का गठन किया है। गृह मंत्रालय ने कहा एक अधिसूचना में कहा कि यह न्यायाधिकरण गैरकानूनी गतिविधियों (रोकथाम) अधिनियम, 1967 के तहत स्थापित किया गया है और इसकी अध्यक्षता दिल्ली उच्च न्यायालय की न्यायाधीश संगीता धींगड़ा सहगल करेंगी।


अधिसूचना में कहा गया है कि यह न्यायाधिकरण यह फैसला करेगा कि मणिपुर के मैतेई उग्रवादी संगठनों को "गैरकानूनी संगठन" के रूप में घोषित करने के लिए पर्याप्त साक्ष्य हैं या नहीं। पिछले महीने प्रतिबंधित संगठनों में पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) और इसकी राजनीतिक शाखा, रिवोल्यूशनरी पीपुल्स फ्रंट (आरपीएफ), यूनाइटेड नेशनल लिबरेशन फ्रंट (यूएनएलएफ) और इसकी सशस्त्र शाखा मणिपुर पीपुल्स आर्मी (एमपीए), पीपुल्स ' रिवोल्यूशनरी पार्टी ऑफ खांगलेईपक (पीआरईपीएके) और इसकी सशस्त्र शाखा 'रेड आर्मी' शामिल किया गया।

इसके अलावा खांगलेईपक कम्युनिस्ट पार्टी (केसीपी) और इसकी सशस्त्र शाखा रेड आर्मी, खांगलेई याओल योल कन्बा लुप (केवाईकेएल), समन्वय समिति (कोरकॉम) और एलायंस फॉर सोशलिस्ट यूनिटी खांगलेईपक (एएसयूके) भी इसमें शामिल है। गृह मंत्रालय ने कहा कि मणिपुर के ये आठ मैतेई उग्रवादी संगठन एक जनवरी, 2013 से 31 जुलाई, 2018 तक की पांच वर्षों की अवधि में 756 हिंसक घटनाओं में शामिल रहे थे। इस दौरान उन्होंने 35 सुरक्षाकर्मियों सहित 86 लोगों की हत्या कर दी थी।   

ये समूह पैसे इकठ्ठा करने के लिए लोगों को धमकी, फिरौती और लूटपाट के जैसे कृत्यों में शामिल रहे हैं। ये लोग सार्वजनिक राय को प्रभावित करने के लिए विदेशी स्रोतों से संपर्क बनाते हैं और अपने अलगाववादी उद्देश्य को हासिल करने के हथियार और प्रशिक्षण देते है। ये लोग हथियार और गोला बारूद चलाने के प्रशिक्षण, भंडारण जैसे कामों को करने के लिए पड़ोसी देशों में शिविर बनाए रखने वाली गतिविधियों में भी शामिल हैं।