तिहाड़ जेल में बंद निर्भया केस के चारों गुनहगारों को जेल प्रशासन ने नोटिस थमाकर उनसे आखिरी इच्छा पूछी है। उनसे पूछा गया है कि 1 फरवरी को तय उनकी फांसी के दिन से पहले वह अपनी अंतिम मुलाकात किससे करना चाहते हैं? उनके नाम कोई प्रॉपर्टी है तो क्या वह उसे किसी के नाम ट्रांसफर करना चाहते हैं। कोई धार्मिक किताब पढ़ना चाहते हैं या किसी धर्मगुरु को बुलाना चाहते हैं? अगर वह चाहें तो इन सभी को 1 फरवरी को फांसी देने से पहले पूरा कर सकते हैं। इस बीच यह भी खबर मिली है कि चारों में से एक ने अपनी जिंदगी खत्म होने के डर से खाना छोड़ दिया है जबकि दूसरा भी कम खाना खा रहा है। जेल अधिकारियों से पता चला है कि चारों में से एक विनय ने दो दिनों तक खाना नहीं खाया था, लेकिन इसे बार-बार खाना खाने के लिए कहा गया तो थोड़ा खाना खाया।

उधर, केंद्र सरकार ने जघन्य अपराध के गुनाहगारों की ओर से फांसी से बचने के लिए न्यायिक प्रक्रियाओं के दुरुपयोग पर अंकुश लगाने के इरादे से सुप्रीम कोर्ट में बुधवार को एक अर्जी दायर करके शत्रुघ्न चौहान मामले में जारी दिशा-निर्देशों में संशोधन का अनुरोध किया है। गृह मंत्रालय के जरिए दायर अर्जी में केंद्र ने शत्रुघ्न चौहान मामले में 2014 के दिशा-निर्देशों में बदलाव का अनुरोध किया है। अपनी अर्जी में सरकार ने कहा है कि यह निर्णय ‘आरोपी-केंद्रित’ है और इसे ‘पीड़ित केंद्रित’ बनाए जाने पर विचार किया जाना चाहिए। वर्ष 2012 के दिल्ली के निर्भया कांड में चार दोषियों की मौत के वारंट के लंबित निष्पादन के संदर्भ में केंद्र की अर्जी आई है।

गृह मंत्रालय ने कहा है कि सजा पाए दोषी की पुनर्विचार याचिका, भूल सुधार याचिका (क्यूरेटिव) और दया याचिका के निपटारे की समय सीमा तय होनी चाहिए। कोई राष्ट्रपति के पास दया याचिका दाखिल करना चाहता है तो डेथ वारंट जारी होने के सात दिन के अंदर ही करने की अनुमति दी जानी चाहिए। अगर राष्ट्रपति दया याचिका खारिज कर देते हैं, तो सात दिन में फांसी हो जानी चाहिए। उसकी पुनर्विचार याचिका या भूल सुधार याचिका का कोई महत्व न हो। केंद्र सरकार ने ये भी मांग की है कि न्यायालय के साथ-साथ राज्य सरकार और जेल अधिकारी को भी डेथ वारंट जारी करने का अधिकार दिया जाए। फिलहाल सिर्फ मजिस्ट्रेट ही डेथ वारंट जारी कर सकते हैं।

गौरतलब है कि शत्रुघ्न चौहान मामले में तीन न्यायाधीशों की पीठ ने 2014 में मौत की सजा के गुनहगारों के अधिकारों के संरक्षण के लिए विभिन्न दिशा-निर्देश जारी किए थे और यह घोषणा की थी कि दया याचिका के निपटारे में बेवजह लंबी देरी मृत्युदंड को आजीवन कारावास की सजा में तब्दील करने का आधार है। केंद्र सरकार की अर्जी में दया याचिका खारिज होने के बाद फांसी के लिए 14 दिनों की नोटिस अवधि को घटाकर सात दिन करने का भी अनुरोध किया गया है। अर्जी में कहा है कि ये दिशा-निर्देश पीड़ितों और उनके परिवार के सदस्यों के अपूरणीय मानसिक आघात, पीड़ा, मनोवेग, राष्ट्र की सामूहिक अंतरात्मा और विद्रोही प्रभाव को नजरंदाज करते हैं, जो मृत्युदंड का इरादा है। अर्जी में कहा गया है कि एक ही मामले में मौत की सजा का सामना कर रहे कई गुनाहगारों को अलग-अलग समय पर स्वतंत्र रूप से भिन्न-भिन्न कानूनी उपायों का लाभ उठाने के लिए चुना जाता है, तो फांसी की सजा को लंबा खींचा जा सकता है। इन पहलुओं को ध्यान में रखते हुए क्यूरेटिव पिटीशन और दया याचिका दायर करने के लिए एक निश्चित समय सीमा तय की जानी चाहिए।

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