छठ पूजा (Chhath puja) का माहौल है। खरीदारी जारी है। खबरें आ रही हैं कि बिहार में सुपली और दऊरी महंगी हो गई है। लोगों की भीड़ जुट रही है कि वह छठ व्रत करने के लिए नई सूप (soop) खरीद लें। आखिर ये सूप इतना जरूरी क्यों है? 

सूप की इस जरूरत का राज छिपा है, इसके बनने के पीछे की कहानी में। दरअसल सूप का निर्माण बांस की खपच्चियों से होता है। संस्कृत में इस बांस को वंश या वंशिका कहते हैं। ये धरती पर पाई जाने वाली इकलौती ऐसी घास है जो सबसे तेजी से बढ़ती है। इसी बांस की बनी बांसुरी को श्रीकृष्ण ने अपने होठों पर जगह दी है। अंदर से खोखली, लेकिन फूंक मार दो जीवन में सुर घोल देने वाली बांसुरी। कहते हैं कि बांस में खुद श्रीहरि विष्णु का निवास है तो इसके धारीदार पत्ते शिव के स्वरूप हैं। इस तरह बांस का पेड़ हरिहर स्वरूप भी है। 

जब भी कभी सुख में वृद्धि की कामना की जाती है तो कहा जाता है कि बांस की तरह दिन दोगुनी, रात चौगुनी बढ़ोतरी हो। ऐसा होता भी है। दरअसल बांस सिर्फ 8 हफ्तों में 60 फीट ऊंचे हो जाता है। कई बार तो एक दिन में ये घास एक मीटर तक बढ़ जाती है। इसी बांस की खपच्चियों से बनी सुपली से जब छठ व्रत का अनुष्ठान किया जाता है तो यह मान्यता होती है कि वंशबेल में इसी तरह की वृ़द्धि होती रहे और जैसे बांस तेजी से निर्बाध गति से बढ़ जाता है। घर-परिवार और उसकी तरक्की बढ़ने में भी कोई बाधा न आए।

बांस की कहानी सिर्फ इतनी ही नहीं है। कहावत है, डूबते को तिनके का सहारा। लोक आस्था मानती है कि यह तिनका कुछ और नहीं बांस ही है। जब धरती पर जल प्रलय आई, स्वयंभू मनु को नाव बनानी हुई तो उसने बांस जोड़कर ही एक बड़ी नौका तैयार की थी। जिस दिन प्रलय ने धरती को डुबोना शुरू किया तो नाव तक पहुंचने के रास्ते पर जल ही जल भर गया। तब मनु एक बांस के सहारे ही नाव तक पहुंचा। श्रीहरि ने हर परिस्थिति में रक्षा का वचन दिया था, इसलिए मनु ने बांस को भी उनका एक स्वरूप ही माना था। 

एक बार ऋषि परशुराम के क्रोध से धरती डोलने लगी थी तब देवताओं ने बांस से टेक लगाकर उसे सहारा दिया। खुद शेषनाग, जिनके फन पर ये धरती टिकी हुई है। वह जब लक्ष्मण के रूप में त्रेतायुग में थे। मेघनाद के शक्तिबाण से आहत होने के बाद भूमि पर गिर पड़े। उस समय धरती का संतुलन बिगड़ ही जाता, अगर ऐन मौके पर महादेव शिव ने बांस का सहारा देकर उसे रोक न लिया होता।