आतंकी संगठन हिज्बुल्लाह के संस्थापक मौलवी अली अकबर की मौत हो गई है। मौलवी की मौत कोरोना वायरस से होना बताया गया है। मौलवी अली अकबर कभी सीरिया में ईरान का राजदूत भी रहा चुका था। वह ईरान के सर्वोच्च नेता रहे अयोतुल्लाह रुलाह खोमानी के काफी करीबियों की लिस्ट में शुमार था। साल 1970 में अली अकबर ने मुस्लिम मिलिटेंट ग्रुप के साथ गठजोड़ किया था।

खबर है कि अली अकबर की मौत नॉर्थ तेहरान के एक अस्पताल में हुई है। अली अकबर के बारे में बताया जाता है कि वो अक्सर काला लिबास पहनना पसंद करते था। ताकि वो खुद को इस्लाम के पैंगम्बर मुहम्मद का अनुयायी बता सके। बताया जाता है कि इरान में हुए विवादित चुनाव के बाद मौलवी अली अकबर पिछले करीब 10 सालों से इराक के पवित्र शहर कहे जाने वाले सिटी ऑफ नजफ में रहता था। एक बम हमले में उसका दाहिना हाथ भी खराब हो गया था।
हिज्बुल्लाह वहीं आतंकी संगठन है जिसपर साल 1983 में बेरूत स्थित यू,ए, एंबेसी पर हमला करने का आरोप लगा था। इस हमले में 63 लोगों की मौत हो गई थी। इसके बाद यू.एस. की तरफ से किये गये जवाबी हमले में 241 लोगों की मौत हुई थी। उस वक्त हिज्बुल्लाह ने हमले में अपनी संलिप्ता से इनकार किया था। ले
इरान में अगले हफ्ते होने वाले राष्ट्रपति चुनाव के लीडिंग उम्मीदवार कहे जाने वाले इब्राहिम रेसी ने मौलाना अली अकबर की मौत पर अपनी संवेदना जाहिर की है।

बता दें कि साल 1947 में तेहरान में जन्म लेने के बाद अली अकबर की मुलाकात खोमानी से एक मौलवी के तौर पर हुई थी। इसके बाद वो धीरे-धीरे खोमानी का करीबी बन गया। साल 1982 में खोमानी ने अली अकबर को सीरिया में तैनात किया था। इस्लामिक क्रांति के बाद अली अकबर ने इरान में Paramilitary Revolutionary Guard की स्थापना में सहयोग किया।
सीरिया का राजदूत रहते हुए उन्होंने इस फोर्स को हिज्बुल्लाह की मदद से काफी बढ़ाया। इरान में हुए ग्रीन मूवमेंट आंदोलन के दौरान अली अकबर ने वहां के तत्कालीन नेता विपक्ष मीर हुसैन मौसावी और माहदी कारौबी की मदद की थी। साल 1979 के इरान आंदोलन में सक्रिय रहने वाला अली अकबर ने बाद में इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ इरान में अंदरुनी मामलों के मंत्री का पद भी संभाला था।