अमृतसर का स्वर्ण मंदिर के बारे में तो आप जानते ही होंगे। लेकिन यहां एक और मंदिर है दुर्गियाना मंदिर जो हिंदुओं के प्रमुख तीर्थ स्थानों में से एक है। इस स्थान पर प्रभु राम अश्वमेध यज्ञ के समय आए थे और इसी कारण इसे अत्यधिक पावन और पवित्र समझा जाता है। 

कहा जाता है कि इस हिंदू मंदिर का इतिहास 16वीं सदी पुराना है जबकि गुरु हरसाईमल कपूर के प्रयासों से धन एकत्रित करने के बाद मंदिर के पुनर्निर्माण की शुरुआत 1921 में हुई और स्थापत्य के लिहाज से सिखों के स्वर्ण मंदिर से प्रेरणा ली गई।

बता दें कि इस मंदिर की नींव प्रसिद्ध समाज सुधारक एवं स्वतंत्रता सेनानी, पंडित मदनमोहन मालवीय ने सन 1924 में गंगा दशमी के दिन रखी थी।

यह मंदिर एक अद्वित्तीय स्थान पर एक पावन झील के बीचों-बीच स्थित है। भक्तगण एक पुल के जरिए इस मंदिर तक पहुंचते हैं। अमृतसर के स्वर्ण मंदिर की स्थापत्य कला से प्रेरित इस मंदिर की छतरियां और गुंबद स्वर्ण मंदिर की प्रतिकृति लगते हैं। 

मंदिर के निर्माण में सफ़ेद संगमरमर का अत्यधिक इस्तेमाल हुआ है। संध्या के समय मंदिर के गुंबद रंग-बिरंगी बत्तियों से प्रकाशमान होते हैं।

इस मंदिर के दरवाजे चांदी की उत्कृष्ट कारीगरी से बने हुए हैं और इसीलिए इसे 'रजत मंदिर' भी कहा जाता है। मंदिर में प्रवेश करते ही अखंड ज्योति के दर्शन होते हैं। यहां देवी दुर्गा के एक रूप शीतला माता की भी आराधना होती है।

मंदिर के प्रांगण में बड़ा हनुमान और देवी सीता के मंदिर भी बने हुए हैं। श्री गुर हरसहाय मल कपूर की मूर्ति भी मंदिर के ठीक सामने देखी जा सकती है। प्रतिवर्ष हज़ारों की संख्या में भक्तगण इस मंदिर में देवी मां के दर्शनों के लिए आते हैं।