तालिबान ने महिलाओं को शर्तों के साथ सरकारी नौकरी, निजी सेक्टर एवं अन्य रोजगारों में काम करने की अनुमति दी है। तालिबान का कहना है कि महिलाएं कामकाज के लिए निकल सकती हैं, लेकिन उन्हें शरीयत के नियमों का पूरा पालन करना ही होगा। हालांकि तालिबान का यह रवैया भी उसके पुराने दौर के मुकाबले काफी उदार कहा जा सकता है। अमेरिका के वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर 11 सितंबर, 2001 को हुए हमले से पहले अफगानिस्तान में उसकी सरकार थी। तब महिलाओं पर कड़ी पाबंदियां लागू थीं। यहां तक कि उन्हें मामूली गलतियों पर भी कोड़े खाने जैसी बर्बर सजाएं झेलनी पड़ती थीं।

तालिबान के एक नेता ने नाम उजागर न करने की शर्त पर ब्लूमबर्ग से बातचीत में कहा कि महिलाएं जहां भी चाहें काम कर सकती हैं, लेकिन शरिया कानून का पालन करना होगा। इससे पहले तालिबान ने सरकारी कर्मचारियों से अपील की थी कि वे काम पर लौट आएं और उन्हें किसी भी तरह का खतरा नहीं होगा। इसके अलावा उन्होंने महिला कर्मचारियों से भी वापस लौटने की बात कही है। तालिबान के सांस्कृतिक आयोग ने कहा कि महिलाएं पीड़ित नहीं रह सकतीं। अमेरिका समेत कई देशों ने तालिबान से अपील की है कि वे महिलाओं के साथ बर्बरता से पेश न आएं।

इसके अलावा संयुक्त राष्ट्र की ओर से भी ऐसी ही मांग की गई है। इसके अलावा खुद तालिबान भी 20 साल के संघर्ष के बाद सत्ता में लौटा है और वह दुनिया के सामने अपनी अपेक्षाकृत उदार छवि पेश करना चाहता है। इससे पहले 1996 से 2001 के दौरान तालिबान ने बेहद कट्टर शासन किया था और शरिया नियमों को सख्ती के साथ लागू किया जाता था। तब महिलाओं को घर से बाहर काम करने की परमिशन नहीं थी। इसके अलावा वे स्कूलों और कॉलेजों में भी नहीं जा सकती थीं। यदि उन्हें बाहर निकलना है तो फिर किसी पुरुष साथी का संग रहना और बुर्का पहनना जरूरी होता था। ऐसा न करने पर महिलाओं को पत्थरों से मारने और फांसी तक देने की सजाएं दी जाती थीं।