तालिबान, दहशत और आतंक का एक नाम। क्रूरता का उदाहरण और काम सिर्फ और सिर्फ जुल्म। जो मेरी सुनेगा, वहीं जिंदा रहेगा। ऐसा मानने वाले मरे दिमाग वालों की जमात। लेकिन यही तालिबान अब घबराने लगा है। डराने वाला अब डरने लगा है। जिसने गोले-बारूद के धमाकों से सबके कान सुन्न कर दिए थे, खुद उसके कानों तक जवाबी शोर पहुंचने लगा है। ये आवाज पंजशीर से आ रही है। अफगानिस्तान का वो इलाका जो आज तक आजाद ही रहा। इसकी कहानी बड़ी दिलचस्प है। 

इस कहानी को जानने से पहले रुख करते हैं हॉलीवुड की फेमस मूवी 300 की ओर। 2006 में रिलीज जैक स्नाइडर की ये फिल्म एक फेमस वॉर मूवी हैं। फिल्म की कहानी बताती है कि कैसे सिर्फ 300 लड़ाकों ने पर्शिया से आ रही लाखों की सेना को अपने इलाके में घुसने नहीं दिया था और उन्हें धूल चटा दी थी।

इस मूवी में सिर्फ 300 लड़ाके अकेले किरदार नहीं थे, बल्कि कहानी में उस इलाके की भौगोलिक लोकेशन भी अपना रोल निभाती है। एक पहाड़ी के पीछे बसा खूबसूरत मैदान और इसे पार करने के लिए सिर्फ एक संकरा रास्ता।

बस इसी से कुछ मिलती-जुलती कहानी है पंजशीर इलाके की। इतिहास कहता है कि तालिबानी यहां कभी कब्जा नहीं कर सके और सोवियत संघ की सेना भी इसे कभी कब्जे में नहीं ले सकी। बेशक, ये यहां के लड़ाकों की बहादुरी का सबूत है। लेकिन इसका क्रेडिट पंजशीर की जियोग्रॉफिकल लोकेशन को भी जाता है।

पंजशीर के अंदर जो भी है, समझिए वो एक किले में है। पंजशीर की ताकत का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि जब अमेरिकीयों ने तालिबान पर हमला बोला था तब वो पंजशीर ही था जिसकी बदौलत उन्होंने काबुल पर कब्जा जमाया था।

इस घाटी के 150,000 से ज्‍यादा लोग ताजिक समुदाय से जुड़े हैं। वहीं तालिबान संगठन में ज्‍यादातर लोगों की आबादी पश्‍तूनों की है। यह घाटी अपने पन्‍ने के भंडार के लिए भी मशहूर है। पंजशीर घाटी साल 2001 से आज तक अफगानिस्‍तान का सबसे सुरक्षित क्षेत्र माना गया है।

इसकी भौगोलिक स्थिति की बात करें तो पंजशीर घाटी अफगानिस्तान के उत्तर-पूर्व में स्थित है। यहां बिना किसी सहायता के जरिए पहुंचना नामुमकिन है। क्योंकि पंजशीर घाटी काबुल को सालंग पास से होते हुए पुल-ई-खुमरी, कुंदूज और मजार-ए-शरीफ से जोड़ती है। यानी पूरी घाटी एक तरीके सालंग पास के जरिए उत्तरी और दक्षिणी अफगानिस्तान को जोड़ती है।

सालंग पास ही वो जगह है जो हमलों के लिए बेहद कठिन है। यहां पर तालिबान को आने के लिए ऊंचे-ऊंचे पहाड़ों से आना होगा, जो कि बहुत मुश्किल है।

पंजशीर घाटी हमेशा से अफगानिस्तान के लिए जरूरी रास्ता रहा है। यहां करीब 100 किलोमीटर लंबा रास्ता है। ये दो पास में विभाजित होता है। पहला खवाक पास और दूसरा अंजोमन पास। खवाक पास करीब 12,624 फीट ऊंचा है। अंजोमन पास करीब 14,534 फीट ऊंचा है।

अंजोमन पास बदखशान इलाके के ऊपर से गुजरता है। इतिहास में देखें तो इसी रास्ते से सिकंदर और तैमूर की सेनाएं आती-जाती थीं।

पंजशीर घाटी राजधानी काबुल से 150 किलोमीटर दूर हिंदूकुश पहाड़ों के नीचे स्थित है। यहां एक पंजशीर नदी भी है। इसी के नाम पर घाटी को पंजशीर नाम मिला है। हिंदू मिथकों की मानें तो पुराणों में यह पंचमी नदी के नाम से जानी जाती थी। बाद में फारसी-अरबी भाषा के प्रभाव में मीठे पानी ये दरिया पंजशीर बन गया। गांधार के नाम के साथ अफगान के इन इलाकों का जिक्र भी कई पौराणिक कथाओं में हुआ है।

ये थी वजह, जिसके कारण पंजशीर का नाम इतिहास में हमेशा आजाद रहने वाली घाटी के नाम से दर्ज है। अब तालिबानी इस पर कब्जा करने का सपना देख रहे हैं। उन्हें अहमद मसूद की चुनौती भी सुनाई दे रही है। देखते हैं कि आमने-सामने की इस लड़ाई का क्या नतीजा निकलेगा।