पूर्वोत्तर राज्य असम के 27 जिलों में से 9 मुस्लिम बहुसंख्यक हो गए हैं। शायद इसीलिए वहां 30 जुलाई को राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर में 20 लाख लोगों को स्टेटलेस घोषित किया जा रहा है। ये लोग बांग्लादेश से आए शरणार्थी हैं। ज्यादातर लोग जिन्हें स्टेटलेस यानि राज्यविहीन घोषित किया जा रहा है, वे मुस्लिम हैं। लिहाजा असम में एक बार फिर सांप्रदायिक तनातन बढ़ने लगी है।


सरकार की तरफ से 30 जुलाई एनआरसी की तरफ से पेश किया जाने वाला दूसरा और अंतिम मसौदा होगा। इससे पहले 31 दिसंबर, 2017 को जारी किए गए मसौदे में असम की 32 मिलियन जनता में से 19 मिलियन लोग शामिल थे।


सूत्रों के मुताबिक केंद्र सरकार इन लोगों को काम के लिए दीर्घकालिक बायोमेट्रिक परमिट प्रदान करने पर विचार कर रही है, हालांकि इन लोगों को यहां कोई राजनीतिक या जमीन खरीदने का आधिकार नहीं होगा। फिलहाल इस बात की भी कोई जानकारी नहीं है कि उन लोगों के साथ क्या होगा जो पहले ही यहां संपत्ति खरीद चुके हैं।


सुप्रीम कोर्ट के वकील उपमायूं हजारिका का कहना है कि एनआरसी से बाहर किए गए लोगों को विदेशियों में शामिल नहीं किया जा सकता है, इसके लिए कार्यवाही शुरू होने से पहले उन्हें एक ट्रिब्यूनल घोषित किया जाना चाहिए। उपमायूं का कहना है कि ट्रिब्यूनल के साथ उन्हें निकालने में हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट को सालों लग जाएंगे। गुवाहाटी हाई कोर्ट ने ट्रिब्यूनल द्वारा विदेशी घोषित किए गए कुछ लोगों के स्वामित्व वाली भूमि अधिग्रहण करने के निर्देश दिए हैं।


शायद ही दुनिया में कहीं एक ही दिन में इतनी बड़ी आबादी की कानूनी कार्रवाई के तहत नागरिकता निरस्त की गई होगी। लेकिन असम में अवैध आप्रवासन के मुद्दे की जटिलता और 4 से 10 मिलियन तक विदेशीयों की जनसंख्या ने सरकार को ऐसा कदम उठाने पर मजबूर किया है। एक दशक से भी कम समय में यहां मतदाताओं की संख्या 50 प्रतिशत बढ़ी है। 1970 में 5,701,805 से 1979 में 8,537,493 हो गई है, जिससे अवैध घुसपैठियों के खिलाफ छः वर्षीय आंदोलन शुरू हुआ। यह अचानक वृद्धि 1971 के युद्ध का भी परिणाम था जिसने पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) से भारत के विभिन्न हिस्सों, मुख्य रूप से असम में बड़े पैमाने पर प्रवाह को मजबूर कर दिया था।


वर्तमान में एनआरसी के नवीनीकरण की प्रक्रिया का गुवाहाटी स्थित एनजीओ, असम पब्लिक वर्क्स (एपीडब्ल्यू) द्वारा 2009 में दायर पीआईएल का परिणाम है। जिसमें दावा किया गया है कि 4.1 मिलियन अवैध बांग्लादेशियों को असम मतदाता लिस्ट में शामिल कर लिया गया है। काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान, वैष्णव संत संत श्रमंत शंकरदेव के जन्मस्थान जैसे राष्ट्रीय स्थलों पर अवैध अप्रवासियों ने अतिक्रमण कर दिया है। 1951 के एनआरसी के नवीनीकरण करने का निर्णय 1985 के ऐतिहासिक असम समझौते में किया गया था, लेकिन इस पर काम 2015 के बाद ही शुरू हुआ जब यह मामला उच्च न्यायालय की निगरानी में आया।