सुप्रीम कोर्ट ने सख्ती से केंद्र सरकार को सेंट्रल विस्टा परियोजना के पुनर्विकास योजना को आगे बढ़ाने के लिए मंजूरी दे दी है। इस परियोजना में एक नई संसद भवन और एक सामान्य केंद्रीय सचिवालय का निर्माण होगा। तीन न्यायाधीशों वाली पीठ ने जोर दिया कि इस परियोजना के लिए धरोहर संरक्षण समिति (एचसीसी) की मंजूरी अनिवार्य होगी और विकास कार्य के लिए आगे बढ़ने से पहले परियोजना सलाहकार द्वारा इसे प्राप्त किया जाना चाहिए। 20,000 हजार करोड़ की यह परियजोना के लिए सुप्रिम कोर्ट ने पहले रद्द कर दिया था लेकिन केंद्र सरकार के बार बार याचिका लगाने पर कोर्ट ने मंजूरी दे दी है। कोर्ट ने कहा कि यह परियोजना बहुत ही खर्चिली है।

इस परियोजना के लिए पीठ के तीसरे न्यायाधीश, न्यायमूर्ति संजीव खन्ना, भूमि उपयोग के परिवर्तन और एचसीसी की पूर्व स्वीकृति के संबंध में असंतुष्ट थे। इन्होंने भूमि उपयोग के संदर्भ में परियोजना को "कानून में बुरा" बताया है। न्यायाधीश ने कहा कि जन भागीदारी का कोई भी समझदारी से खुलासा नहीं है। असंतुष्ट न्यायाधीश ने भी पर्यावरण मंजूरी को अपर्याप्त पाया है। हालांकि, उनके विचार से कुछ फायदा नहीं होगा क्योंकि अधिकांश बेंच ने भूमि उपयोग के परिवर्तन और पर्यावरण मंजूरी के अनुदान पर केंद्र के फैसले को कंबल मंजूरी दे दी है।


जानकारी के लिए बता दें कि सरकार ने अदालत में इस परियोजना का बचाव किया था, जिसमें तर्क दिया गया था कि 1927 में खोला गया मौजूदा ब्रिटिश युग का संसद भवन, कम जगह, कोई अग्नि सुरक्षा मानदंड या भूकंप सबूत नहीं था। इसने यह भी कहा था कि सरकार की दक्षता में सुधार के लिए सभी केंद्रीय मंत्रालयों को एक स्थान पर होना चाहिए। सरकार ने यह भी तर्क दिया था कि सेंट्रल विस्टा परियोजना एक नीतिगत निर्णय है और जब तक वे मौलिक अधिकारों का उल्लंघन नहीं करते, अदालत नीतिगत निर्णयों को रद्द नहीं कर सकती।