‘तुम सारे दिन घर में ही तो रहती हो, करती क्या हो? ’ , ऐसी बातें हम अकसर समाज में गृहणियों के लिए सुनते हैं, लेकिन हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने इसे लेकर बड़ी टिप्पणी की है। सुप्रीम कोर्ट ने बीते दिन एक केस की सुनवाई के दौरान कहा कि घर में रहने वाली महिलाओं के काम उनके पति के ऑफिस के काम जितना ही महत्वपूर्ण है। 

एक मोटर वाहन दुर्घटना के मुआवजे को लेकर हो रही सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह सोच कि घर पर रहने वाली महिलाएं काम नहीं करती या फिर वह घर में कोई आर्थिक सहायता नहीं देती, गलत है और अब इससे बाहर आने की जरूरत है। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने कार दुर्घटना में जान गंवाने वाले एक दंपती के रिश्तेदारों को मिलने वाले मुआवजे की रकम को बढ़ा दिया। हाई कोर्ट ने इस मामले में मृत महिला की आय इसलिए कम आंकी थी क्योंकि वह गृहणी थी।

जज बोले, महिलाएं हर दिन 299 मिनट, पुरुष 97 मिनट करते हैं घरेलू काम

जस्टिस एनवी रमण की अध्यक्षता में तीन जजों की पीठ ने कहा कि गृहणियों की कड़ी मेहनत और श्रम के लिए आर्थिक मूल्य तय करना काफी मुश्किल है लेकिन यह महत्वपूर्ण है। साल 2011 की जनगणना के मुताबिक, भारत में करीब 16 करोड़ महिलाएं घर संभालती हैं। वहीं, घर संभालने वाले पुरुषों की संख्या करीब 60 लाख है। सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय की रिपोर्ट के अनुसार औसतन महिलाएं हर दिन 299 मिनट तक ऐसे घर के काम करती हैं जिनके लिए उन्हें कोई भुगतान नहीं मिलता। वहीं पुरुष घर के कामों के लिए औसतन एक दिन में 97 मिनट देते हैं। इन सबके बावजूद यह सोच कि गृहणियां काम नहीं करती या फिर घर में आर्थिक मदद नहीं देती, गलत है।

कोर्ट ने बढ़ाया मुआवजा

पीठ ने मोटर वाहन दुर्घटना के पीडि़तों पूनम और उनके पति विनोद के परिवार को 22 लाख रुपए की जगह 33.2 लाख का मुआवजा देने का भी आदेश दिया। हाई कोर्ट ने यह रकम 22 लाख रुपये तय की थी। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि आदेश देते वक्त अदालतों को घर पर रहने वाली महिलाओं के अप्रत्यक्ष आर्थिक योगदान को भी ध्यान में रखना चाहिए।