नागालैंड में सत्तारूढ़ नागालैंड डेमोक्रेटिक प्रोग्रेसिव पार्टी (एनडीपीपी) के दो विधायकों को लेकर विपक्षी नागालैंड पीपुल्स पार्टी (एनपीपी) की ओर से दायर एसएलपी को स्वीकार करते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने नागालैंड विधानसभा अध्यक्ष विखो–ओ होशु और इन दो विधायकों को दो सप्ताह में जवाब देने के लिए नोटिस दिया है। नागा पीपुल्स पार्टी (एनपीपी) ने एक एसएलपी दायर करके न्यायालय से इन दो विधायकों का सत्तारूढ़ दल में विलय के राज्य विधानसभा अध्यक्ष के आदेश को रोकने की मांग की थी। विधानसभा अध्यक्ष ने एनपीपी के टिकिट पर निर्वाचित हुये दो विधायकों का एनडीपीपी में विलय को स्वीकार किया था। मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई और न्यायाधीश दीपक गुप्ता की बेंच ने इन दो विधायकों और राज्य विधानसभा अध्यक्ष को नोटिस दिया हैं। सर्वोच्च न्यायालय ने एसएलपी निवेदकों को भी नोटिस दिया हैं।

वरिष्ठ वकील ए शरण, वकील अमित कुमार और अविजित मनी त्रिपाठी ने माननीय न्यायाधीशों की बेंच में एनपीपी की ओर से पक्ष और तर्क रखे गये। वहीं दोनों विधायकों की ओर से मुकुल रोहतगी ने पैरवी की थी। एसएलपी के माध्यम से जिस मुद्दे को उठाया गया वो दूरगामी परिणाम वाला हैं। मुद्दा यह हैं कि राज्य विधानसभा स्पीकर ने एनपीपी के टिकिट पर निर्वाचित दो विधायकों का सत्तारूढ़ एनडीपीपी में विलय करने के आदेश से संविधान की 10वीं अनुसूची के अंतर्गत दलबदल नियमों का सीधा उल्लंघन होता हैं। दलबदल नियमों के मुताबिक मूल पार्टी से विधायकों का किसी दूसरी पार्टी में विलय होने के लिए कम से कम दो-तिहाई संख्या का होना जरूरी हैं। अगर इस संख्या से कम विधायकों का विलय को गैर-कानूनी और दलबल नियम के विरुद्ध माना जाएगा। 

दो-तिहाई संख्या से कम विधायकों का विलय किसी दूसरी पार्टी में विलय होता हैं तो विलय होने वाले विधायकों को विधानसभा की सदस्यता के लिए अयोग्य किया जा सकता हैं। देश में छोटे राज्यों में यह मुद्दा महत्वपूर्ण हो जाता है कि छोटे दलों से विधायकों का सत्तारूढ़ दल में विलय से सत्तारूढ़ दल को अल्पमत की सरकार को बहुमत की सरकार बनाने की इंजिनियरिंग को बढ़ावा मिलता हैं। नागालैंड में सत्तारूढ़ दल एनडीपीपी के पास सिर्फ 32 विधायक का समर्थन हैं जो बहुमत से एक ही अधिक हैं। छोटे दलों से विधायकों का सत्तारूढ़ दल में विलय को स्पीकर के द्वारा मान्यता मिलने से सीधे तौर पर संविधान की 10वीं अनुसूची के नियमों का उल्लंघन हुआ हैं। एनपीपी ने इस याचिका में यह भी उल्लेख किया कि विधानसभा अध्यक्ष ने न तो एनपीपी को और न ही इन दो विधायकों को एनडीपीपी में विलय होने से पहले नोटिस दिया। हालांकि एनपीपी ने अप्रैल के प्रथम सप्ताह में इन दो विधायकों का सत्तारूढ़ दल में विलय को मान्यता देने के विधानसभा अध्यक्ष के आदेश को रोकने के लिए सर्वोच्च न्यायालय में एक एसएलपी दायर की थी जिसको न्यायालय ने किसी तकनीकी कारण से खारिज कर दिया था।