उच्चतम न्यायालय (Supreme Court) ने 2011 के सामाजिक, आर्थिक एवं जातीय जनगणना के मूल आंकड़े सार्वजनिक (caste census data public) करने की मांग करने वाली महाराष्ट्र सरकार (Maharashtra Government) की याचिका बुधवार को खारिज कर दी। न्यायमूर्ति ए. एम. खानविलकर और न्यायमूर्ति सी. टी. रविकुमार की पीठ ने केंद्र सरकार द्वारा उन जनगणना आंकड़ों को अनुपयोगी बताये जाने पर गौर किया और कहा कि इन्हें सार्वजनिक करने का आदेश नहीं दिया जा सकता। इससे भ्रम की स्थिति उत्पन्न होगी। 

महाराष्ट्र सरकार (Maharashtra Government) ने शीर्ष अदालत में एक जनहित याचिका दायर कर कहा था कि स्थानीय निकाय चुनावों में अन्य पिछड़ी जातियों (ओबीसी) (OBC) के लिए आरक्षण लागू करने के लिए उसे जनगणना के मूल आंकड़ों की आवश्यकता है। पीठ ने याचिका खारिज करते हुए कहा कि जब केंद्र सरकार खुद ही स्वीकार कर चुकी है कि उन आंकड़ों में कई प्रकार की खामियां हैं। इस वजह से वह उपयोगी नहीं हैं। ऐसे में उन आंकड़ों को सार्वजनिक करने का आदेश सिर्फ इसलिए नहीं दिया जा सकता कि स्थानीय चुनावों में ओबीसी के लिए आरक्षण (Reservation for OBC) लागू किया जाना है। 

शीर्ष अदालत (Supreme Court) ने केंद्र सरकार का पक्ष रख रहे सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता (Solicitor General Tushar Mehta) के उस तर्क पर भी गौर किया जिसमें उन्होंने कहा था कि 2011 के सामाजिक, आर्थिक एवं जातीय जनगणना अधिनियम 1948 के तहत नहीं कराये गये थे। उस वक्त संबंधित मंत्रालय के कार्यकारी निर्देशों के आधार पर एक लक्षित लाभ संबंधित परिवारों तक पहुंचाने के उद्देश्य से जनगणना कराये गये थे। सर्वोच्च अदालत ने महाराष्ट्र सरकार द्वारा स्थानीय निकायों में आरक्षण लागू करने के उद्देश्य से जातीय आंकड़े जुटाने के उद्देश्य से एक आयोग के गठन संबंधी जानकारी पर गौर किया। अदालत ने कहा कि आरक्षण लागू करने के लिए राज्य सरकार कानून में उपलब्ध अन्य उपचारात्मक उपाय करने के लिए स्वतंत्र है। महाराष्ट्र सरकार ने एक जनहित याचिका दायर शीर्ष अदालत से गुहार लगायी थी कि वह केंद्र सरकार को जनगणना के मूल आंकड़े जारी करने का आदेश दे।