नई दिल्ली. सुप्रीम कोर्ट ने पत्नी के साथ पति द्वारा की गई क्रूरता के संबंध में एक अहम फैसला सुनाते हुए कहा कि मृत्यु पूर्व दिए गए पत्नी के बयान साक्ष्य अधिनियम के तहत भारतीय दंड संहिता की धारा 498 ए के तहत आरोपों की सुनवाई के दौरान स्वीकार्य होंगे. सीजेआई एनवी रमण की अगुवाई वाली पीठ ने हालांकि कहा कि साक्ष्य स्वीकार किए जाने से पहले कुछ आवश्यक शर्तें पूरी की जानी होंगी.

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सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पहली शर्त यह है कि मामले में पत्नी की मृत्यु का कारण प्रश्न के दायरे में आना चाहिए. उच्चतम न्यायालय ने और भी शर्तों का जिक्र किया. अदालत ने केरल हाई कोर्ट के आदेश को चुनौती देने वाली एक याचिका पर सुनवाई के दौरान यह टिप्पणी की. केरल हाई कोर्ट ने अपने आदेश में याचिकाकर्ता को भारतीय दंड संहिता की धारा 304बी के तहत बरी कर दिया था, लेकिन धारा 498 ए के तहत दोषी करार दिया था.

इससे पहले मैरिटल रेप यानी वैवाहिक दुष्कर्म अपराध है या नहीं इसको लेकर दिल्ली हाई कोर्ट की दो जजों की बेंच का बंटा हुआ फैसला सामने आया था. इस मामले की सुनवाई के दौरान दोनों जजों की राय एक मत नहीं दिखी. इसके चलते दोनों जजों ने इस मुद्दे को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के लिए प्रस्तावित किया है. दिल्ली हाई कोर्ट की दो जजों की बेंच में से एक जज ने अपने फैसले में मैरिटल रेप को जहां अपराध माना है, वहीं दूसरे जज ने इसे अपराध नहीं माना है.

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सुनवाई के दौरान जहां खंडपीठ की अध्यक्षता करने वाले न्यायमूर्ति राजीव शकधर ने वैवाहिक बलात्कार अपवाद को रद्द करने का समर्थन किया, वहीं न्यायमूर्ति सी हरि शंकर ने कहा कि आईपीसी के तहत अपवाद असंवैधानिक नहीं है और एक समझदार अंतर पर आधारित है. दरअसल, याचिकाकर्ता ने आईपीसी की धारा 375 (दुष्कर्म) के तहत वैवाहिक दुष्कर्म को अपवाद माने जाने को लेकर संवैधानिक तौर पर चुनौती दी थी. इस धारा के अनुसार विवाहित महिला से उसके पति द्वारा की गई यौन क्रिया को दुष्कर्म नहीं माना जाएगा जब तक कि पत्नी नाबालिग न हो.