त्रिपुरा विधानसभा चुनावों में इस बार सभी की नजर सबरूम सीट पर है। इस सीट पर सीपीएम ने दो बार से जीततीं आ रहीं रीताकर मजूमदार को टिकट दिया। वहीं उनके सामने भाजपा के शंकर रॉय और कांग्रेस के मनोरंजन दास हैं। रीताकर ने पिछले दोनों विधानसभा चुनाव में कांग्रेसी उम्मीदवार प्रेमतोश नाथ को करारी शिकस्त दी थी। ऐसे में कांग्रेस ने नए चेहरे दास को रीताकर के मुकाबले चुनावी मैदान में उतारा। दोनों पार्टियों के नए चेहरे के चलते रीताकर का दावा इस सीट पर सबसे मजबूत माना जा रहा है।


पिछले चुनाव (2013) की बात करें तो रीताकर के सामने कांग्रेसी उम्मीदवार प्रेमतोश नाथ थे। रीताकर ने ये चुनाव 5207 वोटों से जीता।  रीताकर को 21,404 तो प्रेमतोश को 16197 वोट मिले थे। 2008 में भी ये सीट सीपीएम की उम्मीदवार रीताकर के खाते में गई। उन्होंने कांग्रेस के प्रेमतोश को 8307 वोटों से हराया। रीताकर को 19181 तो वहीं प्रेमतोश को 10874 वोट मिले थे। बता दें कि शुरुआती दो विधानसभा चुनाव को छोड़ दिया जाए तो ये सीट आठ बार से सीपीएम के खाते में ही गई है। 1967 और 1972 के चुनाव में यहां कांग्रेस ने बाजी मारी थी।

1967 में हुए पहले चुनाव में ही दिलचस्प मुकाबला देखने को मिला। दरअसल इस सीट से कांग्रेस और सीपीआई दोनों के उम्मीदवारों का नाम एक जैसा ही था। दोनों ही पार्टियों ने ए. मग नाम के उम्मीदवारों को टिकट दिया था। हालांकि पहले चुनाव में कांग्रेस को बंपर जीत मिली। यहां कांग्रेस ने सीपीआई के उम्मीदवार को 6996 वोटों से हरा दिया। कांग्रेसी उम्मीदवार को 11638 तो वहीं सीपीआई के उम्मीदवार को 4642 वोट मिले थे। 1972 के चुनाव में भी यहां कांग्रेस का ही दबदबा रहा। हालांकि इस बार ये सीट जनरल के लिए आरक्षित कर दी गई। ऐसे में कांग्रेस ने यहां से कलिपादा बनर्जी को मैदान में उतारा। वहीं सीपीएम ने सुनील कुमार चौधरी को टिकट दिया। कांग्रेस ने ये चुनाव भी 3040 वोटों से जीत लिया। कलिपादा को 6180 तो वहीं सीपीएम को 3140 वोट मिले।


1977 में पहली बार इस सीट पर सीपीएम का खाता खुला। इस जीत के बाद सबरूम सीट पर सीपीएम की ऐसी लहर चली कि कांग्रेस के लिए आज तक वापसी करना मुश्किल हो गया। 1977 के विधानसभा चुनाव में सीपीएम के उम्मीदवार सुनील कुमार चौधरी ने अपनी हार का बदला लिया और कांग्रेस के उम्मीदवार रबिंद्र कुमार को 2825 वोटों से मात दी। सुनील चौधरी को 6537 तो वहीं रबिंद्र को 3712 वोट मिले।


इसके बाद इस सीट पर सीपीएम के उम्मीदवार सुनील कुमार चौधरी का दबदबा लगातार बीस साल तक बना रहा। उन्होंने इस सीट पर जीत का चौका लगाया। 1983 के चुनाव में कांग्रेस ने चौधरी के सामने एक बार फिर अपना उम्मीदवार बदल दिया। हालांकि अहिर चंद्रा भौमिक कुछ कमाल नहीं दिखा पाए और 1137 वोटों से हार गए। चौधरी को इस चुनाव में 9118 तो वहीं भौमिक को 7981 वोट मिले। 1988 में कांग्रेस ने फिर अपना उम्मीदवार बदल दिया, लेकिन नतीज सिफर ही रहा। चौधरी के हाथों मनोरंजन देबनाथ को 496 वोटों से हार मिली। चौधरी को 10605 तो वहीं देबनाथ को 10109 वोट मिले।


लगातार तीन हार झेलने के बाद कांग्रेस ने इस सीट से परिमल नंदी को अपनी किस्मत आजमाने का मौका दिया, लेकिन चौधरी के आगे उनकी एक न चली। चौधरी ने लगातार चौथी बार इस सीट पर लाल झंडा बुलंद किया। इस चुनाव में चौधरी को 12714 तो वहीं परिमल को 11451 वोट मिले। 1263 वोटों से चौधरी ने ये चुनाव अपने नाम किया।

1998 में सीपीएम ने चौधरी की जगह इस सीट से गौरकांत गोस्वामी को टिकट दिया। वहीं कांग्रेस ने फिर से मनोरंजन देबनाथ को उनके खिलाफ उतारा।  इस चुनाव को गोस्वामी ने 5386 वोटों से जीता। उन्हें 15507 तो देबनाथ को 10121 वोट मिले। 2003 में भी इस सीट से गोस्वामी ने ही बाजी मारी। उन्होंने कांग्रेसी उम्मीदवार शंकर माला को 5584 वोटों से हराया। गोस्वामी को 16445 तो वहीं शंकर माला को 10861 वोट ही मिले।