शिलोंग । मेघालय उच्य न्यायालय  ने अस्पतालों और उनके कार्याकर्ताओं को लोगो  को जन्म और मृत्यु के पंजीकरण के लिए परेशान नहीं करने का आगाह किया  है । न्यायालय ने कहा कि भविष्य में कोई भी व्यक्ति इस तरह की शिकायत मिलने पर न्यायालय के समक्ष कड़ी कार्रवाई करने के लिए आवेदन कर सकता है। अदालत ने मंगलवार को अनीता सिनरेम द्वारा दायर एक जनहित याचिका का निपटारा किया, जिसमें जन्म और   मृत्यु अधिनियम के 1969 के पंजीकरण में मेघालय में बनाए गए नियमों के कई कमियों को न्यायालय के समक्ष दर्शया गया । जिसके चलते आम जनता  को कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा था ।

इससे पहले, अदालत ने आदेशों की एक श्रृंखला जारी करने के बाद स्वास्थ्य सेवा निदेशालय के कर्मियों  को सुधारने और राज्य में जन्म और मृत्यु के पंजीकरण  की प्रक्रिया को सरल बनाने के लिए आवश्यक उपाय किए जाने को कहा गया । अदालत ने उम्मीद जताई कि निदेशालय को नियमित रूप से जन्म और मृत्यु के पंजीकरण की प्रक्रिया की निगरानी करनी चाहिए और किसी भी चूक के मामले में अपेक्षित कार्रवाई करने के दौरान कानून का अनुपालन सुनिश्चित करना चाहिए।

अदालत ने अनाथ बच्चों के पंजीकरण और छोडे गए बच्चों के पंजीकरण के मुद्दे को भी उठाया और प्रश्नो के जवाब में अतिरिक्त वरिष्ट सरकारी वकील ने अदालत के सामने रजिस्ट्र जनरल गृह मंत्रालय द्वारा जारी एक दिशा-निर्देश  परिपत्र को भी अदालत के समक्ष पेश किया, जो 1969 के अधिनियम की धारा 3 (3) के तहत 3 जुलाई 2015 को जारी किया गया था । 

अधिनियम में कहा गया है कि यदि अनाथ बच्चे के जन्म  की जगह नहीं जारी जाती है तो वह जगह जहां अनाथालय स्थित है या जहां  है उसे बच्चे के जन्म के स्थान के रूप में माना जा सकता है । दूसरा, यदि बच्चे का जन्म ज्ञात नहीं है, उम्र उस मुख्य चिकित्सा अधिकारी (सीएमओ ) द्वारा निर्धारित किया जा सकता है, जहां उस क्षेत्र पर अधिकार क्षेत्र होता है ।