दशहरा आते ही टीवी चैनल वाले रावण के अहंकार की कहानी और उस पर भगवान राम की मर्यादा भरी कहानी को सुनाते है। जैसे की ये कोई आखों देखी कहानी है। यह सब सुनने के बाद आपको लगने लगता है कि रावण तो राक्षसो का राजा था जो सोने की लंका यानी श्री लंका में रहता था। लेकिन आपको यह बता दू कि ब्राह्मण कुल में जन्मे रावण को भारतीय भी भगवान मानते है। वो परम ग्यानी व शिव भक्त था। यहा तक की कुछ लोग यह समझते है कि रावण का जन्म भारत में ही हुआ था।

यही जो लोग रावण को मानते है उन्होंने भारत में कई जगह पर रावण के मंदिर बनाए है। रीती रिवाजों के साथ इस मंदिर में पूजा पाठ और रावण स्मरण होता है। जो लोग रावण को मानते है वो अधिकतर यह सोचते है कि रावण भगवान शिव का परमभक्त, प्रातांड़ पंडित और पराक्रमी योद्धा था। इस लिए लोग समझते है कि रावण की पूजा से सारी समस्याए हल हो जाएंगी और जीवन सुखी होगा। खास करके वाल्मीकि समाज के लोग रावण को बहुत मानते है। यह लोग तो दशहरा के दिन रावण का दहन नहीं देखते बल्की उसकी पूजा में मग्न रहते है। वाल्मीकि समाज के झारखंड के पूर्व मुख्य मंत्री शिबू सोरेन ने दशहरा में रावण दहन का आमंत्रण इस लिए स्वीकार नहीं किया क्योंकि उनका मानना था ऐसा करने से कोई बुराई पर जीत नहीं मिलती।
महाराष्ट्र
महाराष्ट्र के ही आदिवासी बहुल मेलघाट (अमरावती जिला) और धरोरा (गढचिरौली जिला) के कुछ गांवों में रावण और उसके पुत्र मेघनाद की पूजा होती है। यह परंपरा विशेष तौर पर कोर्कू और गोंड आदिवासियों में प्रचलित है जो रावण को विद्वान व्यक्ति मानते हैं और पीढियों से वे इस परंपरा का निर्वाह कर रहे हैं। हर साल होली के त्यौहार के समय यह समुदाय फागुन मनाता है, जिसमें कुर्कू आदिवासी रावण पुत्र मेघनाद की पूजा करते हैं।मध्य प्रदेश
विदिशा, इंदौर का परदेशी पुरा और दमोह नगर के हजारों वाल्मीकि समाज और कान्यकुब्ज ब्राहमण रावण मंदिर में पूजा करते हैं। कई क्षेत्रों में दशहरे पर रावण का श्राद्घ भी किया जाता है।
झारखंड
कानपुर के निकट भी एक रावण मंदिर है, जो दशहरे के मौके पर साल में एक दिन के लिए खुलता है।उत्तर प्रदेश
इलाहाबाद में कटरा का रामलीला शुरु होने पर पहले दिन हर साल रावण जुलूस निकाला जाता है और स्थानीय निवासियों का दावा है कि यह परंपरा पांच सौ साल पुरानी है। वाल्मीकि समाज के लोगों का यह भी मानना है कि रावण की जन्म भूमि उत्तर प्रदेश है।
हिमाचल प्रदेश
कांगड़ा जिले में शिवनगरी के नाम से मशहूर बैजनाथ कस्बा है। जहा कुछ लोग रावण के भक्त है, जो यह मानते है कि रावण की सुरक्षित जगह यही थी जो राम का बाण लगने से बचाती।कर्नाटक
कोलार जिले में भी लोग फसल महोत्सव के दौरान रावण की पूजा करते हैं और इस मौके पर जुलूस निकाला जाता है। ये लोग रावण की पूजा इसलिए करते हैं क्योंकि वह भगवान शिव का भक्त था। लंकेश्वर महोत्सव में भगवान शिव के साथ रावण की प्रतिमा भी जुलूस की शोभा बढाती है। इसी राज्य के मंडया जिले के मालवल्ली तालुका में रावण को समर्पित एक मंदिर भी है।राजस्थान
जोधपुर जिले के मन्दोदरी क्षेत्र में रावण एवं मन्दोदरी के विवाह स्थल पर आज भी रावण की चवरी नामक एक छतरी मौजूद है। पुरातत्व विभाग की देखरेख में उसका प्रबंधन हो रहा है। शहर के चांदपोल क्षेत्र में स्थित महादेव अमरनाथ एवं नवग्रह मंदिर परिसर में रावण के आराध्य देव शिव एवं आराध्य देवी खारान्ना की मूर्तियां पहले से स्थापित हैं और इसी परिसर में अब रावण का मंदिर बनाया गया है।