नेपाल के प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली देश की संसद के निचले सदन में बहुमत साबित नहीं कर सके। इसके बाद अपने आप उनके हाथ से पीएम की कुर्सी चली गई। दूसरी ओर, सरकार बनाने के लिए जुगत और प्रक्रिया भी शुरू हो गई है। नेपाल की राष्ट्रपति बिद्या देवी भंडारी ने सभी पार्टियों से बहुमत की सरकार बनाने का दावा पेश करने के लिए कहा है। इससे पहले विपक्षी दलों ने राष्ट्रपति से नई सरकार के गठन की प्रक्रिया शुरू करने की अपील की थी।

संसद में बहुमत के लिए जरूरी 136 वोट न मिलने से ओली को बड़ा झटका लगा। उन्होंने बाद में कैबिनेट की एक बैठक भी की। वहीं दूसरी ओर विपक्षी दलों- नेपाली कांग्रेस, कम्यूनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल( माओवादी केंद्र) और जनता समाज पार्टी के एक धड़े ने राष्ट्रपति भंडारी से अपील की कि नई सरकार के गठन की प्रक्रिया शुरू की जाए। उन्होंने भंडारी से आर्टिकल 76 (2) लागू करने की अपील की जिसमें स्पष्ट बहुमत न मिलने पर राष्ट्रपति को पीएम नियुक्त करने का अधिकार दिया गया है।

इस दौरान पीएम ऐसा सदस्य होता है जो दो या ज्यादा पार्टियों का समर्थन जुटा सके। राष्ट्रपति भवन की ओर से जानकारी दी गई है कि भंडारी ने पार्टियों के नेताओं से आगे आकर प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार का नाम गुरुवार रात 9 बजे तक देने के लिए कहा है। हालांकि, मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक ओली के विपक्ष के पास भी पर्याप्त वोट नहीं हैं। ऐसे में मुमकिन है कि सबसे बड़ी पार्टी का नेता होने के चलते ओली को फिर से PM बना दिया जाए।

इससे पहले संसद के विशेष सत्र में वोटिंग के दौरान ओली को सिर्फ 93 वोट मिले जबकि उन्हें कम से कम 136 वोटों की दरकार थी। विश्वास मत के खिलाऱ 124 वोट पड़े। 15 सांसद तटस्थ रहे जबकि 35 सांसद वोटिंग से गायब रहे। इसके साथ ही आर्टिकल 100(3) के मुताबिक अपने आप ही ओली PM पद से मुक्त हो गए।

फ्लोर टेस्ट के पहले ही ओली को एक बड़ा झटका लगा था जब उनकी पार्टी के सांसदों के एक वर्ग ने सोमवार को संसद के विशेष सत्र में भाग नहीं लेने का फैसला किया था। पार्टी के एक नेता भीम रावल ने कहा था कि पार्टी के असंतुष्ट गुट के 20 से अधिक विधायकों ने सत्र का बहिष्कार करने का फैसला किया। इसके बाद ओली को अपनी ही पार्टी के असंतुष्ट गुट से वोट मिलने की संभावना नहीं रह गई थी।