कर्ज से लदी मॉर्गेज फर्म दीवान हाउसिंग फाइनेंस लिमिटेड के शेयर जल्द ही शेयर मार्केट से डी-लिस्ट हो सकते हैं।  नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल ने पिरामल कैपिटल एंड हाउसिंग फाइनेंस को डीएचएफएल के अधिग्रहण के लिए मंजूरी दे दी।  

इसके लिए कंपनी ने 37,250 करोड़ की पेशकश की थी।  दिवालिया कानून के तहत रेज्योलूशन प्रक्रिया के दौरान यूनियन बैंक ऑफ इंडिया की अगुआई वाले कर्जदाताओं ने डीएचएफएल के अधिग्रहण के लिए पिरामल की बोली का समर्थन किया था।  पिरामल कैपिटल एंड हाउसिंग फाइनेंस अब जल्द डीएचएफएल का अधिग्रहण कर लेगी। 

सूत्रों के मुताबिक आईबीसी गाइडलाइन और सेबी के निर्देशों के तहत डीएचएफएल के शेयर पिरामल फाइनेंस की ओर से इसके अधिग्रहण के बाद डी-लिस्ट हो जाएंगे।  हालांकि एचपी चतुर्वेदी और रविकुमार दुरईस्वामी वाली बेंच ने कहा है कि अधिग्रहण पर आखिरी मुहर नेशनल कंपनी लॉ अपीलीय ट्रिब्यूनल और सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर निर्भर करेगी।  रेजोल्यूशन प्लान को फरवरी 2021 में आरबीआई से मंजूरी मिल चुकी है, जबकि कंपटीशन कमीशन ऑफ इंडिया ने इसे अप्रैल 2021 में मंजूरी दी थी। 

 

कंपनी के प्रमोटर अपने ऑफर के साथ सुप्रीम कोर्ट में अपील कर चुके थे।  वे इस रेजोल्यूशन प्रक्रिया को रोकना चाहते थे लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इसकी इजाजत नहीं दी।  डीएचएफएल पर फिक्स डिपोजिट होल्डरों का 5,370 करोड़ रुपये बकाया है।  डीएचएफएल पर बैंकों और वित्तीय संस्थाओं का करीब 91,000 करोड़ रुपये बकाया है।  इसके डूब जाने के बाद मामला एनसीएलटी पहुंचा था। 

डीएचएफएल का रिज्योलूशन काफी मायने रखता है क्योंकि नवंबर 2019 में सरकार की ओर से फाइनेंशियल सर्विस प्रोवाइडर्स को बैंकरप्सी ट्रिब्यूनल में भेजने की इजाजत देने के बाद यहां भेजी जाने वाली यह पहली कंपनी थी।  आरबीआई की ओर से कंपनी के बोर्ड को अपने दायरे में ले लेने के बाद इसे इस ट्रिब्यूनल में भेजा गया था। 

 

शेयरों की डी-लिस्टिंग स्वैच्छिक हो सकती है या फिर किसी कानून का पालन करने में नाकामी पर भी।  आमतौर पर डीलिस्टिंग तब होती है जब कोई कंपनी अपने संचालन को रोक देती है, किसी अन्य कंपनी के साथ मिल जाती है, विस्तार या पुनर्गठन करना चाहती है।  या फिर वह दिवालियापन की घोषणा करती है, निजी बनना चाहती है या लिस्टिंग आवश्यकताओं को पूरा करने में विफल रहती है।  जब डीलिस्टिंग स्वैच्छिक होती है तो कंपनी निवेशकों को पेमेंट करती है ओर फिर एक्सचेंज से अपने स्टॉक वापस ले लेती है।  यदि कंपनी नियमों का पालन नहीं करती है तो स्टॉक एक्सचेंज भी कंपनी को डीलिस्ट होने के लिए मजबूर कर सकता है।