भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने पूर्वोत्तर के अरुणाचल, असम और मणिपुर के बाद अब त्रिपुरा में भी भगवा लहरा दिया। कभी उत्तर और पश्चिम भारत में भी बीजेपी को मजबूत माना जाता था, लेकिन इस चुनावों के बाद उसने पूर्वोत्तर के राज्यों में भी सफलता हासिल कर अपने विस्तान को मजबूती दी है। इस चुनाव में बीजेपी की सबसे बड़ी सफलता त्रिपुरा में मानी जा रही है, जहां 25 साल से अपनी जड़े जमाएं बैठे लेफ्ट फ्रंट को उसने जड़ से उखाड़ दिया है। ऐसे में बीजेपी समेत पूरे संघ परिवार के लिए वैचारिक स्तर पर बड़ी कामयाबी है। पूर्वोत्तर में बीजेपी की जीत के ये पांच प्रमुख कारण हैं।


- त्रिपुरा में मिली अहम जीत के साथ बीजेपी ने उन दावों को भी खारिज कर दिया, जिसमें कहा जा रहा था कि अब मोदी लहर कमजोर पड़ती जा रही है। बीजेपी की जीत इस बात का सबूत है कि जनता को मोदी के विकास एजेंडे पर भरोसा है। कर्नाटक के चुनाव से पहले पार्टी को इससे आत्मविश्वास मिलेगा। इसके अलावा 2019 की संभावनाएं भी इससे मजबूत हुई हैं।


- बीजेपी की इस जीत से कांग्रेस के उन प्रयासों को झटका लगा है, जिसके जरिए वह यह कह रही थी कि अब वह 2014 के झटके से उबर रही है। इस परिणाम से एक बार फिर साबित हुआ है कि कांग्रेस की लोकप्रियता अब भी गिरावट के दौर में है। 2019 के अहम चुनाव से पहले अब कांग्रेस को कर्नाटक में इस हार से उबरकर मुकाबला करना होगा। इसके अलावा वह इस हार से सबक ले देश भर में एंटी-बीजेपी गठबंधन के लिए भी प्रयास कर सकती है।


- आरएसएस के लिए यह जीत बड़ी खुशी देने वाली है। 2001 में उसके 4 प्रचारकों का त्रिपुरा में अपहरण कर लिया गया था और म्यांमार में हत्या कर दी गई थी। तत्कालीन वाजपेयी सरकार के प्रचारकों को छुड़ाने में असफल रहने से यहां संघ को गहरा झटका लगा था। कहा जाता है कि इसके चलते 2004 में संघ ने पूरे मन से बीजेपी का सपॉर्ट नहीं किया था। त्रिपुरा में भगवा लहराने से नागपुर में बैठे संघ के नेतृत्व के मन में भी उत्साह पैदा होगा। ऐसे में 2019 में आरएसएस का पूरा समर्थन बीजेपी को मिलने की पूरी संभावना है।



- नगालैंड की सरकार में बीजेपी की हिस्सेदारी से देश में सबसे लंबे समय से चले आ रहे यहां के उग्रवाद से निपटने में भी मदद मिल सकती है। इस संबंध में 2015 में एक फ्रेमवर्क तैयार हुआ था और अब इसे लागू करने का रास्ता साफ  हो सकता है। इन चुनाव नतीजों से राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल को भी यहां समाधान के प्रयास करने का प्रोत्साहन मिलेगा।


- पूर्वोत्तर में सत्ता पर काबिज होने के बाद बीजेपी गोहत्या जैसे मुद्दों पर नरम रुख अपना सकती है। इसकी वजह ईसाई बहुल राज्यों में जनाधार खिसकने का डर होगा।