पूर्वोत्तर के त्रिपुरा में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने एतिहासिक जीत दर्ज की है, यहां उसने 25 साल पुराने लेफ्ट फ्रंट के किले को ढहा दिया है। इसके साथ ही नागालैंड में भी बीजेपी गठबंधन सरकार बनाती दिख रहा है। वहीं मेघालय में अभी तक किसी भी पार्टी को पूर्ण रूप से बहुमत नहीं मिला है। बता दें कि अरुणाचल, असम और मणिपुर के बाद अब त्रिपुरा में भी बीजेपी की सरकार बन गई है। बीजेपी को त्रिपुरा चुनाव में सबसे ज्यादा फायदा हुआ। इंडिजीनियस पीपुल्स फ्रंट ऑफ  त्रिपुरा (आईपीएफटी) के साथ अलायंस करने का भी उसे फायदा मिला। 2013 में इन दोनों पार्टियों को यहां एक भी सीट नहीं मिली थी। इस बार दोनों सरकार बना रही हैं।


त्रिपुरा चुनाव में सबसे ज्यादा नुकसान कांग्रेस को हुआ 25 साल से सत्ता से बाहर कांग्रेस यहां मुख्य विपक्षी दल था। इस बार उसके हाथ एक भी सीट मिलनी मुश्किल दिख रही है। त्रिपुरा में 2013 में उसके भले सिर्फ 10 विधायक थे, लेकिन पार्टी का वोट शेयर 36.5 प्रतिशत था। चुनाव से पहले कांग्रेस के अधिकतर विधायक पहले टीएमसी बाद में बीजेपी में चले गए। वोट शेयर भी घटकर 2 फीसदी से कम हो गया है। वहीं दूसरी तरफ त्रिपुरा में नाथ संप्रदाय ने बीजेपी को पूरा सहयोग दिया है। यहां की 70 फीसदी आबादी नाथ संप्रदाय से आती है। नाथ संप्रदाय को बीजेपी की तरफ खींचने में यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भी अहम भूमिका निभाई है। योगी ने त्रिपुरा की सात सीटों पर अपनी रैलियां की, वहां पांच पर बीजेपी को जीत मिली है। बता दें कि योगी आदित्यनाथ नाथ संप्रदाय के धर्मगुरु हैं।

गौरतलब है कि पिछले 40 साल के दौरान त्रिपुरा में हुए 8 चुनावों में लेफ्ट का वोट शेयर कभी भी 45 प्रतिशत से कम नहीं था। इस बार ये घटता दिख रहा है। बंगाल में सत्ता जाने के बाद त्रिपुरा लेफ्ट का सबसे मजबूत गढ़ था। त्रिपुरा से भी सत्ता जाने के बाद लेफ्ट के पास अब केवल केरल में ही सत्ता में रह गया है। दूसरी तरफ मेघालय की बात की जाए तो बीजेपी ने भले ही यूडीपी और एनपीपी का साथ छोड़ दिया हो लेकिन कहा जा रहा है कि बीजेपी इन दोनों क्षेत्रीय दलों से हाथ मिलाकर यहां भी सरकार बना लेगी। यहां एनपीपी मेघालय की दूसरी बड़ी पार्टी बन गई है। कांग्रेस को सबसे ज्यादा सीटें मिलीं, लेकिन वह बहुमत के जादुई आंकड़े को नहीं छू पाई है। यहां पिछले नौ साल से कांग्रेस की सरकार है। इस बार यहां बीजेपी, कांग्रेस, यूडीपी और एनपीपी के बीच मुकाबला रहा। वहीं बीजेपी अगर मेघालय में क्षेत्रीय दलों के साथ गठबंधन कर सरकार में आती है तो कांग्रेस के खाते में से असम और मणिपुर के बाद एक और राज्य निकल जाएगा। पिछले विधानसभा चुनाव में बीजेपी का खाता भी नहीं खुला था। वहीं इस चुनाव में एनपीपी और यूडीपी के मजबूत होने से उसे फायदा मिल रहा है। दोनों ही पार्टियां केंद्र में एनडीए के साथ हैं। चुनाव बाद तीनों एक साथ आ सकते हैं।


नगालैंड की बात करें  चुनाव से पहले एनपीएफ  में हुई फूट और यहां के सबसे चर्चित नेता नेफ्यू रियो के  एनडीपीपी में शामिल होने के बाद सबसे ज्यादा फायदा एनडीपीपी और बीजेपी गठबंधनन को होता हुआ दिख रहा है। चुनाव से कुछ महीने पहले बनी एनडीपी सत्ता में आने की बड़ी दावेदार है। एनपीएफ को चुनाव से पहले ही काफी नुकसान हो चुका है। नेतृत्व की लड़ाई में पार्टी को दो हिस्से हो चुके हैं। अब पार्टी के हाथ से सत्ता जाती हुई दिख रही है। सीएम टीआर जेलियांग के लिए बिना नेफ्यू रियो की एनपीएप को जिताने की मुश्किल चुनौती है।  पिछले चुनाव में कांग्रेस के यहां 8 एमएलए थे। ये सभी ने दो साल पहले एनपीएफ में शामिल हो गए थे। इस तरह वर्तमान में यहां कांग्रेस का एक भी एमएलए नहीं है। 15 साल पहले सत्ता में रही कांग्रेस को इस चुनाव में कैंडिडेट मिलने में भी काफी परेशानी हुई। पार्टी ने 23 सीटों पर कैंडिडेट उतारे थे। इनमें से 5 ने नाम वापस ले लिया। इस तरह अब सिर्फ 18 कैंडिडेट मैदान में है।