गुवाहाटी। असम में एनआरसी के अपडेशन की प्रक्रिया जारी है। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद फाइनल एनआरसी का प्रकाशन 31 अगस्त तक होना है। ड्राफ्ट एनआरसी में 40 लाख लोगों के नाम शामिल नहीं थे। इनमें से 4 लाख लोगों ने आपत्तियां और दावे फाइल नहीं किए जबिक 36 लाख ने दावे और आपत्तियां दर्ज कराई है। भारत सरकार ने अभी तक यह फैसला नहीं लिया है कि अंतिम एनआरसी में जिन लोगों के नाम नहीं होंगे उनके साथ क्या किया जाएगा। उधर सुरक्षा एजेंसियों को इस बात की आशंका है कि रेडिकल ग्रुप्स अपने लक्ष्य को हासिल करने के लिए स्थिति का फायदा उठाने की कोशिश कर सकते हैं। 

आ जाएगी मामलों की बाढ़, सरकार को भी आभास

एक अंग्रेजी समाचार पत्र ने उच्च पदस्थ सूत्रों के हवाले से खबर दी है कि जिन लोगों के नाम एनआरसी में नहीं होंगे,उनके संबंध में सरकार अभी तक नीति नहीं बना पाई है। सूत्रों के मुताबिक जिनके नाम फाइनल एनआरसी में नहीं होंगे उनके पास फॉरेनर्स ट्राइब्यूनल्स में अपील करने का अधिकार होगा। साथ ही उन्हें उच्च अदालतों के दरवाजे खटखटाने का भी अधिकार होगा। राज्य सरकार को भी इस बात का आभास है कि फाइनल एनआरसी के बाद केसों की बाढ़ आ जाएगी इसलिए उसने पहले ही फॉरेनर्स ट्राइब्यूनल्स की संख्या बढ़ाने का फैसला लिया है। नए ट्राइब्यूनल्स में सदस्यों की नियुक्ति की प्रक्रिया भी शुरू हो गई है लेकिन सरकार के सामने एक और चुनौती है कि फॉरेनर्स ट्राइब्यूनल्स जिन लोगों को विदेशी नागरिक घोषित कर देंगे उनका क्या होगा क्योंकि सरकार ने इस संबंध में भी कोई नीति नहीं बनाई है। 

ये है सरकार के सामने बड़ी चुनौतियां

सूत्रों का कहना है कि एनआरसी असम में रह रहे भारतीय नागरिकों की सूची है और जिन लोगों के नाम इसमें नहीं होंगे उन्हें किसी विशेष देश का नागरिक माना जाएगा। यह लगभग असंभव है कि इतनी बड़ी संख्या में लोगों को डिपोर्ट किया जाए और न ही कोई देश इन्हें स्वीकार करेगा। आपको बता दें कि एनआरसी में नाम जुड़वाने के लिए कट ऑफ डेट 25 मार्च 1971 है। तब तक इसका पता लगाना मुश्किल होगा कि असम में दशकों से रह रहे व्यक्ति का ऑरिजन क्या है जब तक कि खुद वो खुद आगे नहीं आता और यह घोषित नहीं करता कि वह विशेष देश के विशेष इलाके से है। अगर कोई व्यक्ति यह कबूल भी कर लेता है कि वह अन्य देश से है तो वह देश भी बिना गहन जांच के उसे स्वीकार नहीं करेगा और इस तरह के मामलों में इस तरह का वैरिफिकेशन करने में लंबा वक्त लगेगा। 

उदाहरण के तौर पर अगर कोई व्यक्ति यह स्वीकार करता है कि वह बांग्लादेश के फलां इलाके से है और 1971 से पहले असम में आया था तब बांग्लादेश की सरकार के लिए उसके दावे को वैरिफाई करना मुश्किल होगा। इसके अलावा भारत के लिए लाखों लोगों को देश से बाहर करना भी संभव नहीं होगा क्योंकि इससे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हंगामा खड़ा हो जाएगा। इस तरह का विचार चल रहा है कि जिनके नाम एनआरसी में नहीं होंगे उन्हें वर्क परमिट दे दिया जाए लेकिन अभी तक सरकार इस संबंध में कोई फैसला नहीं ले पाई है। 

अदालतों को भी निस्तारण में लग जाएंगे सालों

सूत्रों का कहना है कि अगर सभी लोग जिनका नाम एनआरसी में नहीं होंगे, ट्राइब्यूनल्स या उच्च अदालतों में जाएंगे तो इन मामलों के निस्तारण में लंबा वक्त लगेगा और कोई भी इसको लेकर भी आश्वस्त नहीं है कि जब तक अदालतें उनके नाम क्लीयर नहीं कर देती तब तक उन्हें मताधिकार से वंचित किया जाएगा या नहीं। अगर ऐसा नहीं हुआ तो संदिग्ध विदेशी सालों तक चुनावों में मतदान करते रहेंगे। आपको बता दें कि एनआरसी के ड्राफ्ट में 40 लाख आवेदनकर्ताओं को शामिल नहीं किया गया। इनमें से करीब 36 लाख ने दावे दाखिल किए हैं। किसी को पता नहीं है कि अन्य 4 लाख लोगों को क्या होगा लेकिन यह तय है कि वे भारतीय नागरिक नहीं है। इस बीच सुरक्षा एजेंसियों को आशंका है कि फाइनल एनआरसी के पब्लिकेशन के बाद जो स्थितियां उत्पन्न होगी, रेडिकल व अन्य इस तरह के तत्व इनका फायदा उठाने की कोशिश करेंगे। उन्होंने स्वीकार किया है कि इस तरह की कोशिशों से बचने के लिए सभी सुरक्षा एजेंसियों को हाई अलर्ट पर रखना होगा।