केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने 10 साल से अधिक पुराने एंट्रिक्स-देवास डील मामले में मंगलवार को प्रेस कॉन्फ्रेंस की. मीडिया से बातचीत में वित्त मंत्री ने पूर्व की यूपीए सरकार पर बड़ा आरोप लगाया. इस मामले के लिए वित्त मंत्रीने कांग्रेस के नेतृत्व वाली पिछली सरकार को जिम्मेदार बताया और कहा कि यह भारत के साथ फ्रॉड हुआ था. 

उन्होंने कहा कि तत्कालीन सरकार की गलतियों को सही करने में 11-12 साल लग गए. 2011 में जब इसे रद्द किया गया तब देवास अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता में चला गया. भारत सरकार ने मध्यस्थता के लिए नियुक्ति नहीं की. 21 दिनों के अंदर मध्यस्थता के लिए नियुक्ति के लिए कहा गया, लेकिन सरकार ने तब भी इसको लेकर नियुक्ति नहीं की.

निर्मला सीतारमण ने कहा कि जब 2005 में यह सौदा हुआ था, तब यूपीए की सरकार थी. डील में घोटाला हुआ है. इसे कैंसल करने में यूपीए सरकार को 6 साल लग गए. मामला इतना बढ़ा है कि एक सेंट्रल मिनिस्टर को गिरफ्तार करना पड़ा था. उन्होंने कहा कि, तत्कालीन यूपीए ने इस सौदे की खबर कैबिनेट को भी नहीं दी. यूपीए की लालच की वजह से मोदी सरकार कई अंतराष्ट्रीय अदालतों में केस लड़ रही है.

क्या है पूरा मामला?

2005 में बेंगलुरु स्थित स्टार्टअप देवास मल्टीमीडिया और इसरो की सब्सिडियरी एंट्रिक्स कॉरपोरेशन के बीच एक डील हुई थी. डील के मुताबिक एंट्रिक्स ने इस कंपनी के लिए एक सैटेलाइट लॉन्च करने और ऑपरेट करने पर सहमति जताई थी. 

समझौते के तहत सैटेलाइट की 90 फीसदी ट्रांसपॉन्डर कपैसिटी यानी डेटा ट्रांसफर करने की क्षमता देवास मल्टीमीडिया को लीज पर मिलनी थी. कंपनी की योजना थी कि इस कपैसिटी के दम पर वह भारत में टेलिकम्युनिकेशन यानी फोन सेवाएं मुहैया कराएगी. इसमें बड़े पैमाने पर विदेशी निवेशकों ने पैसा लगाया था. बाद में पता चला कि सैटेलाइट का इस्तेमाल मोबाइल से बातचीत के लिए तो होना है, लेकिन इसकी मंजूरी भारत सरकार से नहीं ली गई है.

डील में सीधे तौर पर इसरो जैसा शीर्ष संगठन जुड़ा था, ऐसे में सुरक्षा चिंताएं भी बढ़ीं. खास बात यह रही कि इस कंपनी को इसरो के ही पूर्व साइंटिफिक सेक्रेटरी एमडी चंद्रशेखर ने 2004 में बनाया था. बाद में यह बात सार्वजनिक होने पर काफी कोहराम मचा. देवास में लगे विदेशी पैसे और इसे भुनाने की साजिश भी सामने आई. 

इस पर राजनीति गर्माने के साथ ही यह एक बड़े घोटाले के रूप में पेश किया गया. यूपीए सरकार ने साल 2011 में यह डील रद्द कर दी. हालांकि सरकार की इस बात के लिए काफी किरकिरी हुई कि उसे डील रद्द करने में छह साल लग गए. लेकिन असली घोटाला उजागर हुआ 2015 में जब सीबीआई जांच शुरू हुई.