हमारी दुनिया ने प्रथम और द्वितीय विश्व युद्ध के रूप में दो भयावह त्रासदियां देखी हैं, लेकिन 1918 में जब प्रथम विश्व युद्ध खत्म होने की कगार पर था तभी प्रकृति ने एच1एन1 इन्फ्लूएंजा के रूप में अपना कहर बरपाया और कुछ ही महीनों में 50 करोड़ से ज्यादा लोगों की मौत हो गई। यह प्रथम विश्व युद्ध के कारण हुई मौतों से ढाई गुना ज्यादा थी। वैज्ञानिकों के अनुसार उस समय एच1एन1 इन्फ्लूएंजा महामारी से दुनिया की एक तिहाई आबादी संक्रमित हो गई थी।

उस समय यह महामारी इतनी घातक कैसे बन गई? इस सवाल का जवाब हाल ही जियोहैल्थ में प्रकाशित एक शोध में दिया गया है। शोध के प्रमुख वैज्ञानिक हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के जलवायु विशेषज्ञ अलेक्जेंडर मोर ने खराब जलवायु को इसका कारण बताया है। उनका कहना है कि 1914 से 1919 के बीच यूरोप में असामान्य ठंडी हवाओं ने पूरे महाद्वीप को अपनी चपेट में ले लिया था, जिसके चलते प्रथम विश्व युद्ध में निमोनिया और कड़ाके की ठंड से मरने वालों की संख्या में इजाफा तो हुआ ही बाद में यही खराब जलवायु पूरे यूरोप और दुनिया के अन्य देशों में इन्फ्लूएंजा महामारी के तेजी से प्रसार का कारण भी बनी। 

वैज्ञानिकों ने आल्प्स पर्वत मालाओं और दूसरे जलवायु साक्ष्यों का अध्ययन कर अनुमान लगाया कि भयानक शीतलहर के असामान्य प्रवाह के कारण पूरे यूरोप में तापमान तेजी से नीचे गिर गया और युद्ध के दौरान जमकर बारिश हुई। वैज्ञानिक इसका कारण विश्व युद्ध के दौरासन उत्पन्न धूल, और विस्फोटकों को माना, जिसने स्थानीय मौसम को प्रभावित कर संघनन प्रक्रिया को बढ़ा दिया, जिससे वर्षा के हालात बने।

अध्ययन में कहा गया कि इस प्रतिकूल जलवायु ने पक्षियों के प्रवास को भी बदल कर रख दिया था। एच1एन1 इन्फ्लूएंजा महामारी के मुख्य संवाहक मलार्ड बतख, खराब मौसम के कारण पश्चिमी यूरोप से पलायन करने की बजाय वहीं रुके रहे। इन बत्तखों ने संभवत: पानी को संक्रमित कर दिया था, जिससे वायरस इंसानों तक तेजी से पहुंच गया। उधर इस महामारी को बढ़ाने में युद्ध की खतरनाक परिस्थितियों और रासायनिक हथियारों के उपयोग ने और बढ़ावा दिया। संक्रमण के लिए अनुकूल हालात पाकर वायरस म्यूटेंट और ज्यादा घातक हो गया। 

शोधकर्ताओं ने यह भी पाया कि युद्ध के दौरान होने वाली मौतों में वृद्धि आमतौर पर ठंडे मौसम और भारी बारिश के बाद ज्यादा होती है। निमोनिया, हाइपोथर्मिया और अन्य संक्रमण के कारण मरने वालों की तादाद तेजी से बढ़ने लगी। मोर का कहना है कि जैसे-जैसे जलवायु परिवर्तन बढ़ेगा मौसम की असामान्य परिस्थितियां अपने चरम पर होंगी। शोधकर्ताओं ने चेतावनी देते हुए कहा कि उनका अध्ययन एक बानगी है कि मानव के कारण हो रहा जलवायु परिवर्तन भविष्य में कोरोना महामारियों जैसी आपदाओं में कैसे योगदान दे सकता है।