देश में नॉर्थ ईस्ट रेलवे के लिए काफी समय से एक अनोखी चुनौती पेश आ रही थी। ये चुनौती थी रेलवे ट्रैक पर आकर मरने वाले हाथी। जंगली रास्तों से गुजरने वाले रेलवे ट्रैक्स पर अक्सर हाथी आ जाते थे। इससे हाथियों की तो मौत होती ही थी, साथ ही ट्रेन हादसे का भी खतरा रहता था। इससे बचने के लिए नॉर्थ ईस्ट फ्रंटियर रेलवे (एनएफआर) ने इंटरनेट से  मक्खियों के भिनभिनाने की आवाज डाउनलोड की और रेलवे टै्रक्स के किनारे इस आवाज के साउंड सिस्टम लगा दिए। 

मक्खियों की भिनभिनाहट हाथियों को दूर भगाती है, इसलिए एनएफआर ने ये तरीका अपनाया। पिछले साल की आखिरी तिमाही में कुछ ट्रैक्स पर इस तरह से साउंड डिवाइस लगाए थे। प्रयोग सफल होता दिखा तो इसे कुछ और जगह भी लगाया गया। नतीजा भी सकारात्मक दिख रहा है। 6-8 महीने के समय में अब तक 6 हाथी ही ट्रैक्स पर दुर्घटना के शिकार हुए हैं। जैसे जैसे ट्रैक्स पर डिवाइस की संख्या बढ़ेगी, ये आंकड़ा और सुधरेगा। एनएफआर के एडीशनल जनरल मैनेजर लोकेश नारायण बताते हैं कि हमने कुछ रेंज चिन्हित की हैं। इन्हीं रेंज की ट्रैक्स पर साउंड डिवाइस लगाया गया है। ये रेंज कुल 109 किमी की है। इन क्षेत्रों में ट्रेन की रफ्तार भी कम रखने के निर्देश हैं। डिवाइस की आवाज 600 मीटर दूर तक जाती है, इसलिए हाथी दूर रहते हैं। 

ये प्रोजेक्ट ज्यादा महंगा भी नहीं है, क्योंकि इस डिवाइस की कीमत महज दो हजार रुपए आती है। इस प्रोजेक्ट पर्यावरण मंत्रालय और रेल मंत्रालय मिलकर संचालित कर रहे हैं। बता दें कि नॉर्थ ईस्ट ने ये कवायद शुरु करने की प्रेरणा केन्या से ली है। केन्या में भी हाथियों का रेलवे ट्रैक तक आ जाना और ट्रेन से टकराकर मर जाना बड़ी समस्या बन गया था। 2010 में उन्होंने जंगली इलाकों से गुजरने वाली रेलवे ट्रेक के किनारे मधुमख्खी के आर्टिफिशियल छत्ते लगाने शुरु कर दिए। 2 साल में ही ट्रेन से टकराकर मरने वाले हाथियों की संख्या में 97 फीसदी की कमी आ गई। बता दें कि पूर्वोत्तर में 2013 में सबसे ज्यादा 19 हाथियों की ट्रेन से टकराने से मौत हुई है। नॉर्थ ईस्ट में पिछले पांच साल में कुल 55 हाथियों की मौत हुई।  2016 में 12 और 2017 में दस हाथियों की मौत हुई थी।