मेघालय की मेहंदीपथार सीट पर इस बार दिलचस्प मुकाबला देखने को मिल सकता है। दरअसल 2013 में हुए विधानसभा चुनाव में इस सीट से एनसीपी के उम्मीदवार मॉर्थन संगमा ने महज 11 वोटों से जीत दर्ज की थी। उन्होंने कांग्रेसी उम्मीदवार फ्रेंकेस्टिन मोमीन को हराया था, लेकिन इन चुनाव में कांग्रेस की एक चाल ने यहां से सारे समीकरण बदल दिए हैं। एनसीपी के विजेता उम्मीदवार मॉर्थन संगमा कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ रहे हैं। वहीं फ्रेंकेस्टिन मोमीन ने कांग्रेस का हाथ छोड़कर एनपीपी का दामन थाम लिया है।


2018 के चुनाव में इस सीट से बीजेपी ने डिग्रेस डी शिरा और यूडीपी ने कोमोलसिंह आर मराक को मैदान में उतारा है। वहीं एल्बर्थ सराक निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ रहे हैं। बता दें कि मेहंदीपथार सीट पर अब तक नौ बार विधानसभा चुनाव हुए हैं। चार बार कांग्रेस, दो बार एएचएल, एक-एक बार एनसीपी, यूडीपी और एचपीयू पार्टी ने अपना कब्जा जमाया। इस सीट से फे्रंकस्टिन मोमीन और बेनिस्टंड मोमीन ने तीन-तीन बार चुनाव जीता। हालांकि इन दोनों ही विजेता उम्मीदवारों ने दो-दो बार अपनी-अपनी पार्टियां बदली हैं।


1972 में इस सीट पर पहली बार चुनाव हुए। ये सीट कांग्रेस के खाते में गई। कांग्रेस के सीबेंद्र नारायण कोच ने निर्दलीय उम्मीदवार जोशेंद्र चरावा को 341 वोटों से हराया। कोच को 1087 तो वहीं चरावा को 746 वोट मिले। हालांकि 1978 के चुनाव में ये सीट एसटी के लिए रिजर्व हो गई। ऐसे में कांग्रेस को अपने विजेता उम्मीदवार की बजाए लूथूनाथ जे. संगमा को टिकट देना पड़ा। हालांकि एएचएल के उम्मीदवार बेनिस्टंड मोमीन के सामने उनकी कुछ नहीं चली और वे महज 12 वोटों से हार गए। संगमा को 1482 तो वहीं मोमीन को 1494 वोट मिले। 1983 के चुनावों में भी कुछ ऐसा ही हाल रहा। हालांकि चुनाव में कांग्रेस ने अपना उम्मीदवार बदलते हुए फ्रेंकेस्टिन मोमीन को टिकट दिया, लेकिन वो भी ये चुनाव 853 वोट से हार गए। एएचए के उम्मीदवार बेनिस्टंड मोमीन को 3330 तो वहीं फ्रेंकेस्टिन को 2477 वोट मिले।


1988 के चुनाव में एचपीयू के उम्मीदवार बेनिस्टंड मोमीन के सामने जीत की हैट्रिक लगाने की चुनौती थी। इस बार भी कांग्रेस ने अपनी जीत की तलाश में इस सीट से उम्मीदवार को बदल दिया, लेकिन मोमीन ने अपना दबदबा कायम रखते हुए मेहंदीपथार सीट पर जीत की हैट्रिक लगाई। कांग्रेस के जमींद्रो आर मराक को 4687 तो वहीं मोमीन को 5808 वोट मिले। उन्होंने ये मुकाबला 1122 वोटों से जीता। 1993 के चुनाव में इस सीट से कांग्रेस के लिए खुशखबरी आई। कांग्रेस ने एक बार फिर इस सीट फ्रेंकेस्टिन मोमीन को टिकट दिया और उन्होंने ये सीट एचपीयू के दंबग उम्मीदवार बेनिस्टंड से छीन ली। फ्रेंकेस्टिन को 6969 तो वहीं बेनिस्टंड को 6195 वोट मिले। जीत का अंतर 774 वोटों का था।


1998 के चुनाव में बेनिस्टंड मोमीन ने अपनी पार्टी बदल ली। इस बार उन्होंने एचपीयू के जगह यूडीपी के टिकट पर चुनाव लड़ा, लेकिन इस सीट पर फिर से कांग्रेस का ही दबदबा रहा। कांग्रेसी उम्मीदवार फ्रेंकेस्टिन ने लगातार दूसरी बार ये चुनाव जीता। उन्हें 6046, वहीं बेनिस्टंड को 5901 वोट मिले। जीत का अंतर 145 वोटों का रहा। 2003 के चुनाव में बेनिस्टंड मोमीन ने अपनी हार का सिलसिला तोड़ते हुए फिर से जीत का स्वाद चखा। उन्होंने फ्रेंकेस्टिन मोमीन को जीत की हैट्रिक लगाने से रोक दिया। बेनिस्टंड को 7756 तो वहीं मोमीन को 6791 वोट मिले। हालांकि 2008 के चुनाव में फ्रेंकेस्टिन ने फिर वापसी की और बेनिस्टंड को 186 वोट से हरा दिया। फ्रेंकेस्टिन को 4647 तो वहीं बेनिस्टंड को 4461 वोट मिले। हालांकि 2013 के चुनाव में इस सीट पर एनसीपी ने दखल दी और चुनाव जीत लिया। एनसीपी के उम्मीदवार मॉर्थन संगमा ने महज 11 वोट से फ्रेंकेस्टिन को हराया। मॉर्थन को 5307 तो फ्रेंकेस्टिन को 5296 वोट मिले।