मोदी सरकार ने बड़ा फैसला लिया है जिसके तहत वो जनसंख्या नियंत्रण कानून नहीं लेकर आएगी। हालांकि देश में बढ़ती जनसंख्या के मद्देनजर इसे नियंत्रित करने के कानून की मांग समय.समय पर उठती रही है। देश का एक बड़ा वर्ग सामाजिक.शैक्षिक और आर्थिक पिछड़ेपन एवं धार्मिक वजहों से परिवार नियोजन का सहारा नहीं लेता है। खासकर 2014 में बीजेपी की अगुवाई वाली एनडीए सरकार के केंद्र की सत्ता में आने के बाद से यह मांग जोर पकड़ने लगी।

आपको बता दें कि 1975 में आपातकाल के दौरान नागरिकों के अधिकार छीन लिए गए थे। इंदिरा गांधी की सरकार ने आपातकाल में जो फैसले लिए उनमें सबसे विवादास्पद फैसला था पुरुषों की जबरन नसबंदी का। प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के पुत्र संजय गांधी ने पिछले दरवाजे से इस अभियान की कमान संभाली।

उन्होंने नौकरशाहों को नसबंदी अभियान को सफल बनाने के लिए टारगेट दे दिया। उन्होंने नौकरशाहों को चेतावनी दी थी कि जिनका टारगेट पूरा नहीं होगा उनका वेतन में कटौती की जाएगी या पूरा वेतन ही रोक दिया जाएगा। विभिन्न रिपोर्टों के मुताबिक अभियान के एक साल में ही 62 लाख पुरुषों की जबरन नसबंदी करवा दी गई। नसबंदी के दौरान हुई लापरवाहियों के कारण दो हजार से ज्यादा पुरुषों की मौत भी हो गई। विश्वप्रसिद्ध उपन्यासकार सलमान रुश्दी की किताब मिडनाइट चिल्ड्रन में इस अभियान का जिक्र है।

प्रधानमंत्री ने 15 अगस्त 2019 को आपने लाल किले से देश को संबोधित करते हुए जनसंख्या नियंत्रण की बात कही थी। स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लाल किले के प्राचीर से जनसंख्या नियंत्रण का मुद्दा उठाया था। उन्होंने कहा था कि जो छोटा परिवार रख रहे हैं। वह भी एक प्रकार से देशभक्ति कर रहे हैं। उन्होंने परिवार को दो बच्चों तक सीमित रखने की वकालत की थी। पीएम की इस अपील पर देश में जनसंख्या नियंत्रण पर बहस छिड़ चुकी है। कहा जा रहा है कि कांग्रेस पार्टी भी इस मुद्दे पर सरकार का साथ देने का मन बना चुकी है।