जम्मू-कश्मीर से धारा 370 हटाने के बाद अब नागालैंड में अलग झंडे व संविधान की मांग उठी है। हालांकि केंद्र सरकार ने नगाओं के लिए अलग झंडा और संविधान की एनएससीएन-आईएम (नेशनल सोशलिस्ट काउंसिल ऑफ नगालैंड) की मांग को ठुकरा दिया है। सरकार ने स्पष्ट तौर पर कहा है कि बंदूकों के साये में उग्रवादी समूह के साथ अंतहीन वार्ता स्वीकार्य नहीं की जाएगी। नागा वार्ता के लिए वार्ताकार और नगालैंड के राज्यपाल आर. एन. रवि ने कहा कि केंद्र सरकार दशकों लंबी शांति वार्ता की प्रक्रिया को अविलंब निष्कर्ष पर पहुंचाएगी।

राज्यपाल ने अपने बयान में कहा कि आपसी सहमति से विस्तृत समझौते का मसौदा तैयार किया गया है। इसमें सभी महत्वपूर्ण मुद्दे शामिल हैं। उन्होंने कहा कि दुर्भाग्य से इस समय एनएससीएन-आईएम ने देरी करने का रुख अपना रखा है और अलग नगा राष्ट्रीय झंडा और संविधान जैसे विवादास्पद मुद्दों को उठा रहा है जिस पर वे भारत सरकार के रुख से पूरी तरह अवगत हैं।

रवि ने कहा कि एनएससीएन-आईएम ने समझौते के प्रारूप को ‘शरारतपूर्ण तरीके’ से लंबा खींचा है और इसमें काल्पनिक विषय डाल रहा है। समझौते के प्रारूप पर तीन अगस्त 2015 को एनएससीएन-आईएम के महासचिव थुइंगलेंग मुइवा और सरकार के वार्ताकार रवि ने प्रधानमंत्री मोदी की उपस्थिति में हस्ताक्षर किए थे। उन्होंने यह भी कहा कि एनएससीएन-आईएम के कुछ नेता विभिन्न मीडिया संगठनों के माध्यम से लोगों को ‘बेतुकी धारणाओं और पूर्व धारणाओं’ से गुमराह कर रहे हैं।

नागालैंड में यह समझौता प्रारूप 18 वर्षों तक 80 दौर की वार्ता के बाद आया है। इसके तहत पहली बार 1997 में नगालैंड में दशकों तक उग्रवाद के बाद संघर्षविराम समझौता हुआ था। 1947 में भारत की स्वतंत्रता के तुरंत बाद नगालैंड में उग्रवाद की शुरुआत हो गई थी। राज्यपाल ने कहा कि नागा शांति प्रक्रिया पिछले 5 वर्षों में वास्तव में समग्र बन गई है और निष्कर्ष के चरण तक पहुंच चुकी है।