अफ्रीका दुनिया के सबसे ज्यादा जैवविविधता वाले हिस्सों में माना जाता है। जहरीले सांपों से लेकर प्रकृति को ही अपना भगवान मानने वाली आदिम जनजातियों तक यहां एक से एक बढ़कर एक हैरान करने वाले नजारे मौजूद हैं। अफ्रीका दुनिया की सबसे खतरनाक मक्खी का घर भी है। यह मक्खी इतनी खतरनाक होती है कि इससे ‘मर्डरर’ कहा जाता है। इसको Tsetse, सेतसी और तेतसी भी कहा जाता है। यह इतनी जहरीली होती है कि इंसानों तक के लिए खतरनाक साबित हो सकती है।

इस मक्खी के कारण एक तरीके की नींद की बीमारी होती है जिसे अफ्रीकन स्लीप सिकनेस बीमारी कहते हैं। यह जब किसी को काटती है तो ट्रिपनोसोमा नामक पैरासाइट को शरीर में इंजेक्ट कर देती है। यह इतनी खतरनाक होती है कि अगर इसका समय पर इलाज नहीं किया जाए तो मौत तक हो जाती है। अफ्रीका के ट्रॉपिकल और सब-ट्रॉपिकल इलाकों में सेतसी मक्खी कि कुल 21 प्रजातियां पाई जाती हैं।

सेतसी मक्खी आमतौर पर सहारा और कालाहारी रेगिस्तान के बीच मध्य अफ्रीका में पाई जाती है। यह इंसानों और जानवरों का खून पीकर जिंदा रहती है। अफ्रीका के लगभग 37 देशों में सेतसी मक्खी का प्रकोप है। अफ्रीकी स्लीपिंग सिकनेस अफ्रीका कि एक बहुत ही घातक बीमारी मानी जाती है जो नर्वस सिस्टम से जुड़ी होती है और meningoencephalitis के लक्षणों से चिह्नित होती है। इसमें व्यवहार में परिवर्तन जैसे नींद ना आना, जैसे लक्षण दिखते हैं। सेतसी मक्खी अफ्रीका में हर साल अनेक मौतों के लिए जिम्मेदार होती है।

अफ्रीकी स्लीपिंग सिकनेस बीमारी के पहले चरण में, बुखार, सिर दर्द, खुजली और जोड़ों में दर्द होता है। यह सेतसी मक्खी के काटने के एक से तीन हफ्ते के अंदर शुरू होता है। कुछ हफ्ते या महीनों में दूसरा चरण शुरू होता है। इसमें मरीज को भ्रम, खराब समन्वय, शरीर का सुन्न होना और सोने में कठिनाई महसूस होती है। उप-सहारा अफ्रीका के 36 देशों मे में यह बीमारी नियमित रूप से होती है। 2010 में इस बीमारी के कारण लगभग 9,000 व्यक्तियों की मौत हुई जबकि 1990 में इनकी संख्या लगभग 34,000 थी। एक अनुमान के अनुसार वर्तमान में अफ्रीका मे लगभग 30,000 लोग इस बिमारी से संक्रमित हैं।

इस बीमारी को अगर शुरुआत में ही पहचान लिए जाए तो इसका इलाज संभव हो पाता है और मरीज की जान बचाई जा सकती है। अगर बीमारी को पहचानने में देरी होती है तो यह मरीज के लिए खतरनाक और जानलेवा साबित होता है। रत्नेश बताते हैं कि सेतसी से बचने के लिए अफ्रीका में फील्ड पर काम करने वाले रिसर्चर्स को स्पेशल सूट काम आता है।

इसका धड़ इतना मजबूत होता है कि वह एक मृग, भैंस और हाथी की खाल को छेद सकती है। सेतसी मक्खी 8 से 15 मिलीमीटर की लंबाई की होती है और इसका रंग लाल-भूरा होता है। इसके पंखों पर नसों में, कुल्हाड़ी का आकार होता है जो इसे दूसरी मक्खियों से अलग बनाता है। शांत अवस्था में यह अपने पंखों को मोड़ती है ताकि एक-दूसरे को पूरी तरह से ओवरलैप कर सके। इसके अलावा, सेतसी के सिर के आगे के भाग पर उभरी हुई सूंड प्रोसोकिस से अलग किया जा सकता है। सेतसी मादा मक्खी अपने पूरे जीवन काल मे सिर्फ एक बार नर से मेटिंग करती है और पूरी तरह विकसित सिर्फ 10 लार्वा को जन्म देती है। इसका जीवन 1 से 2.5 साल का होता है।

तंजानिया सरकार और संयुक्त राष्ट्र एजेंसियों के एक्सपर्ट रिसर्चर्स पिछले लगभग 10 साल से जांजीबार में सेतसी मक्खी को नष्ट करने के लिए मिलकर काम कर रहे हैं। इसके लिए वैज्ञानिकों ने लाखों सेतसी मक्खियों को पकड़कर उनमें से नर और मादाओं को अलग किया है। रेडिएशन की मदद से नर सेतसी मक्खियों में प्रजनन की क्षमता खत्म कर दी जाती है। पूरे अफ्रीका में सेतसी मक्खी पर नियंत्रण पाने के लिए इसी तकनीक पर फोकस किया जा रहा है।