पूरी दुनिया इस कोरोना वायरस की महामारी से जूझ रही है। देश के विभिन्न राज्यों में भी संक्रमण के नए मामले तेजी से सामने आ रहे हैं। पूर्वोत्तर राज्यों की बात करें तो मिजोरम एक नजीर बनकर उभरा है जिसने सफल प्रबंधन करके वायरस के फैलाव को रोकने में सफलता हासिल की है।

मिजोरम में कोविड-19 का पहला सकारात्मक मामला 24 मार्च को सामने आया था। उक्त मरीज नीदरलैंड से अपने घर लौटा था। उसने घर भी सावधानी बरती लेकिन उसमें लक्षण सामने आने लगे। 19 मार्च को उसे बुखार आने के बाद मिजोरम मेडिकल कॉलेज और हॉस्पिटल में ले जाया गया। वहां पर पता चला कि उसमे कोरोना वायरस टेस्ट पॉजिटिव पाया गया है। इसके बाद प्रदेश सरकार और भी सख्त हो गई।


अभी तक कोरोना वायरस के संक्रमण को रोकने के लिए लॉकडाउन सबसे कारगर उपाय बनकर उभरा है। एक योजनाबद्ध तरीके से इसकी पालना करके ही मिजोरम संक्रमण की चेन तोड़ने में सफल हो पाया है। लॉकडाउन को सफल बनाने में लोगों की पूर्ण भागीदारी और ज़िम्मेदारी की जरूरत होती हैं। पूर्वोत्तर के जनजातीय क्षेत्रों में बंद को प्रबंध करने की एक सामाजिक संस्कृति हैंं। मिज़ोरम में नागरिक समाज संगठनों का एक जाल बिछा हुआ हैं। मिज़ोरम में सभी समुदायों के स्थानीय से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक विभिन्न प्रकार के जनसंगठन बने हुए हैं। आपदा और आपातकालीन संकट से समय में इन नागरिक जन संगठनों की सामाजिक प्रबंध में महत्वपूर्ण भूमिका रहती हैं।


 

लॉकडाउन के दौरान सामाजिक प्रबंध की आचार-संहिता को लागू करने की ज़िम्मेदारी इन जन संगठनों ने संभाल रखी हैं। इन नागरिक जन संगठनों में चर्च और मिज़ो यंग असोशिएशन–वाईएमए प्रमुख हैं। इन नागरिक समाज संगठनों के स्वयं सेवक बल को सामुदायिक पुलिस कहा जाता है जो हर विपरीत परिस्थिति और संकट में सामाजिक प्रबंध से निपटने में निपुण होते हैं। राज्य में सामाजिक साफ-सफाई और चर्च और नागरिक समाज संगठनों के द्वारा समाज में सामाजिक अनुशासन की एक पुरानी स्थापित परंपरा हैं। जैसे जापान में साफ-सफाई को व्यक्तिगत अनुशासन माना जाता हैं। ये नागरिक समाज संगठन सरकार और चर्च के साथ मिलकर सामाजिक प्रबंध को सफल बनाते हैं।

राज्य सरकार ने प्रत्येक जिला को 10-12 ज़ोन में बांटा हैं। प्रत्येक ज़ोन का एक ज़ोनल अधिकारी और नियंत्रण कक्ष होता हैं। नियंत्रण कक्ष में 3 नियंत्रण अधिकारी होते हैं। एक ज़ोन में 10-12 स्थानीय टास्क फोर्स होते हैं। ज़ोनल अधिकारी और इसके नियंत्रण कक्ष अपने – अपने स्थानीय टास्क फोर्स से जुड़ा रहता हैं। स्थानीय टास्क फोर्स की मदद से ज़ोनल ऑफिस गांवों से सब्जियां, दूध, मांस और अन्य उपलब्ध वस्तुओं का संग्रह करती हैं। लोकल टास्क फोर्स राज्य में आपूर्ति-श्रंखला का काम करती हैं। स्थानीय टास्क फोर्स के नेतृत्व में इन वस्तुओं को जरूरतमंदों में वितरण किया जाता है। राज्य से बाहर से आयातित खाने-पीने की सामाग्री की सीमा पर स्थित चेक पोस्ट पर कोविड-19 मेडिकल ऑपरेशनल टीम के द्वारा जांच करने के बाद आगे भेजा जाता हैं।

राज्य से दिल्ली के निज़ामुद्दीन स्थित मरकज में आयोजित तबलीगी जमात के धार्मिक आयोजन में किसी ने हिस्सा नहीं लिया था। मिज़ोरम ने अपनी सीमा पड़ौसी राज्यों और देशों के साथ पूर्णतया बंद कर दिया हैं। सीमा पर लॉकडाउन के पहले दिन से ही लोगों की आवाजाही पर कड़ी निगरानी रखी जा रही हैं। राज्य की सीमा सभी प्रवेश केन्द्रों पर कुयरंटिन हाउस बनाए गए हैं। इसके अलावा एयरपोर्ट के पास भी एक हजार लोगों की क्षमता के क्वारेंटाइन हाउस बनाए गए हैं। देशभर स्थित मिज़ोरम हाउस में भी क्वारेंटाइन सेंटर बनाए गए हैं। राज्य में बाहरी लोगों के सामान्य प्रवेश के लिए जरूरी इनर-लाइन पर्मिट को बहुत पहले ही बंद कर दिया हैं।

 


राज्य में 4 अप्रैल को पहली वाइरोलोजी लैब की स्थापना आइज़ोल स्थित जोरम मेडिकल कॉलेज में हुई। विश्व स्वास्थ्य दिवस के दिन 7 अप्रैल से लैब में काम शुरू हो गया। अब राज्य से संभावित सैंपल को जांच के लिए असम स्थित सिलचर मेडिकल कॉलेज में नही भेजा जाता।

राज्य ने असम के डिब्रुगढ़ से 1000 कोविड 19 टेस्टिंग किट खरीदी हैं। राज्य के एकमात्र कोविड 19 रोगी की सेहत में सुधार आ रहा हैं। राज्य में 500 पीपीई किट उपलब्ध हैं। 20 मार्च को 156 लोगों को क्वारेंटाइन किया गया था। इनमें से 58 लोगों के सैंपल की जांच की गई जिनमें से कोई भी COVID-19 सकारात्मक नहीं पाया गया। 16 लोग संदेह के आधार पर अस्पताल में निगरानी में हैं। 15 संदिग्ध लोगों को अस्पताल से छुट्टी दे दी गई हैं। 7 अप्रैल को 334 नए लोगों की स्क्रीनिंग की गई और अब तक राज्य में कुल 63875 लोगों की स्क्रीनिंग की गई हैं। राज्य की कुल जनसंख्या 11 लाख हैं। राज्य सरकार 15 दिन के लिए और लॉकडाउन बढ़ाने को लेकर केंद्र सरकार को सिफ़ारिश की हैं।


प्रदेश में जनता भी कोरोना के खिलाफ जंग में पूरा सहयोग दे रही हैं। 95-साल की महिला पी नाकलिआनि ने न केवल अपनी एक महीने की पेंशन सीएमआरएफ़ में दी हैं। बल्कि इतनी उम्र में भी मास्क बनाकर जरूरतमंदों को मुफ्त में दे रही हैं।