मिजोरम के मुख्यमंत्री ललथनहवला मुश्किल में घिर सकते हैं। मुख्यमंत्री सहित 9 विधायकों के खिलाफ एंटी करप्शन ब्यूरो(एसीबी)में एफआईआर दर्ज कराई गई है। 

एफआईआर उन आरोपों के आधार पर दर्ज कराई गई है जिनमें कहा गया था कि 2008 के बाद कांग्रेस के विधायकों की संपत्ति में बेतहाशा बढ़ोतरी हुई है। एक आधिकारिक बयान में भाजपा की मिजोरम यूनिट ने कहा कि एफआईआर मुख्यमंत्री ललथनहवला, मंत्री जॉन रोतलुआंगलियाना, पी.सी.ललथानिलाना, दो संसदीय सचिवों एच.खियांग्ते और के.रिंथांगा, विधायक ललरोबियाका, एच.जोथगलियाना, के.एस.थंगा व ललरिनमाविया राल्ते के खिलाफ दर्ज कराई गई है।

राज्य भाजपा का कहना है कि भ्रष्टाचार की वजह से मुख्यमंत्री सहित 9 विधायकों की संपत्ति में अचानक बढ़ोतरी हुई है। 2008 के बाद अगले पांच सालों में दाम्पा और ललरोबियाका की संपत्ति में 2,306 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है जबकि इसी वक्त के दौरान मुख्यमंत्री ललथनहवला की संपत्ति में 311 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है। मुख्यमंत्री की संपत्ति 2008 में 2 करोड़ थी जो पांच साल बाद 9 करोड़ हो गई। 

परिवहन मंत्री जॉन रातलुआंगलियाना की संपत्ति 2013 में 1 करोड़ से बढ़कर 6 करोड़ हो गई। उनकी संपत्ति में 523 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है। समाज कल्याण मंत्री पीसी ललथानलियाना की संपत्ति 2008 में 23 लाख थी जो 2013 में बढ़कर 1 करोड़ हो गई। 

इस तरह उनकी संपत्ति में 428 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है। हाल ही में मिजोरम भाजपा ने एंटी करप्शन ब्यूरो से सत्तारुढ़ कांग्रेस के कुछ विधायकों के खिलाफ जांच शुरु करने का अनुरोध किया था। भाजपा का आरोप था कि कांग्रेस सरकार के कार्यकाल के दौरान विधायकों की संपत्ति में कई गुना बढ़ोतरी हुई है। 

प्रदेश भाजपा के अध्यक्ष प्रोफेसर जेवी लुना ने कहा था कि विधायक होने के कारण संपत्ति में हुई जितनी बढ़ोतरी हुई है उतनी तो गोल्ड माइन के मालिक की भी नहीं होती। ललथनहवला का जन्म 19 मई 1942 को हुआ था। ललथनहवला 11 दिसंबर 2008 से मिजोरम के मुख्यमंत्री हैं। इससे पहले वे 1984 से 1986 तक मुख्यमंत्री रहे। 

इसके बाद 1989 से 1998 तक राज्य के सीएम रहे। 2013 के मिजोरम विधानसभा चुनाव में वे एक और टर्म के लिए चुने गए। यह पांचवी बार था जब वे मुख्यमंत्री बने। मिजोरम में यह रिकॉर्ड है। ललथनहवाल ने नौ बार आम चुनाव लड़ा। ललथनहवाल 1978, 1979, 1984, 1987, 1993, 2003 और 2013 में विधायक चुने गए। 

ललथनहवला ने अपने करियर की शुरुआत मिजोरम डिस्ट्रिक्ट काउंसल के तहत ऑफिस ऑफ इंस्पेक्टर ऑफ स्कूल्स में रिकॉर्डर के रूप में की। इसके बाद उन्होंने 1966 में असम कॉपरेटिव अपेक्स बैंक में असिस्टेंट के तौर पर ज्वाइन किया। उन्होंने मिजो नेशनल फ्रंट के अंडरग्राउंड मूवमेंट में फॉरेन सेक्रेटरी के तौर पर भाग लिया। वे पकड़े गए और उन्हें सिलचर की जेल भेज दिया गया। 1967 में उन्हें जेल से रिहा किया गया। 

इसके बाद उन्होंने कांग्रेस ज्वाइन कर ली। उन्हें तुरंत आईजोल डिस्ट्रिक्ट कांग्रेस कमेटी का चीफ ऑर्गेनाइजर नियुक्त किया गया। 1973 में मिजोरम प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष बने। 1978 और 1979 में वे यूनियन टेरिटरी इलेक्शन में विधायक चुने गए। 1984 में उनके नेतृत्व में कांग्रेस ने विधानसभा चुनाव में भारी जीत दर्ज की और वे मुख्यमंत्री बने। 1986 में जब भारत और एमएनएफ के बीच मिजो शांति समझौता हुआ तो उन्होंने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया। इसके बाद एमएनएफ के नेता पु लालडेंगा मुख्यमंत्री बने।