मिजोरम भाजपा ने मंगलवार को राज्य के एंटी करप्शन ब्यूरो से सत्तारुढ़ कांग्रेस के कुछ विधायकों के खिलाफ जांच शुरु करने का अनुरोध किया है। भाजपा का आरोप है कि कांग्रेस सरकार के कार्यकाल के दौरान उनकी संपत्ति कई गुना बढ़ोतरी हुई है। पार्टी यूनिट की ओर से मीडियो को जारी बयान में कहा गया है कि मुख्यमंत्री ललथनहवला सहित सत्तारुढ़ पार्टी के नेताओं की संपत्ति में तेजी से बढ़ोतरी हुई है। यह बढ़ोतरी भ्रष्टाचार के कारण हुई है।

भाजपा ने 2008 से लेकर अगले पांच साल के दौरान नौ विधाकों की संपत्ति में हुई बढ़ोतरी की जानकारी दी गई है। बयान में कहा गया है कि इस दौरान दंपा से चुने गए लालरोबियाका की संपत्ति में 2,306 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है। इसी समय के दौरान मुख्यमंत्री ललथनहवाल की संपत्ति में 311 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है। 2008 में मुख्यमंत्री ललथनहवला की संपत्ति सिर्फ 2 करोड़ रुपए थी। 2013 में यह 9 करोड़ रुपए हो गई। प्रदेश भाजपा के अध्यक्ष प्रोफेसर जेवी लुना ने कहा कि विधायक होने के कारण संपत्ति में हुई जितनी बढ़ोतरी हुई है उतनी तो गोल्ड माइन के मालिक की भी नहीं होती।

ललथनहवला का जन्म 19 मई 1942 को हुआ था। ललथनहवला 11 दिसंबर 2008 से मिजोरम के मुख्यमंत्री हैं। इससे पहले वे 1984 से 1986 तक मुख्यमंत्री रहे। इसके बाद 1989 से 1998 तक राज्य के सीएम रहे। 2013 के मिजोरम विधानसभा चुनाव में वे एक और टर्म के लिए चुने गए। यह पांचवी बार था जब वे मुख्यमंत्री बने। मिजोरम में यह रिकॉर्ड है। ललथनहवाल ने नौ बार आम चुनाव लड़ा। ललथनहवाल 1978, 1979, 1984, 1987, 1993, 2003 और 2013 में विधायक चुने गए।

ललथनहवला ने अपने करियर की शुरुआत मिजोरम डिस्ट्रिक्ट काउंसल के तहत ऑफिस ऑफ इंस्पेक्टर ऑफ स्कूल्स में रिकॉर्डर के रूप में की। इसके बाद उन्होंने 1966 में असम कॉपरेटिव अपेक्स बैंक में असिस्टेंट के तौर पर ज्वाइन किया। उन्होंने मिजो नेशनल फ्रंट के अंडरग्राउंड मूवमेंट में फॉरेन सेक्रेटरी के तौर पर भाग लिया। वे पकड़े गए और उन्हें सिलचर की जेल भेज दिया गया। 1967 में उन्हें जेल से रिहा किया गया। इसके बाद उन्होंने कांग्रेस ज्वाइन कर ली। उन्हें तुरंत आईजोल डिस्ट्रिक्ट कांग्रेस कमेटी का चीफ ऑर्गेनाइजर नियुक्त किया गया। 1973 में मिजोरम प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष बने।

1978 और 1979 में वे यूनियन टेरिटरी इलेक्शन में  विधायक चुने गए। 1984 में उनके नेतृत्व में कांग्रेस ने विधानसभा चुनाव में भारी जीत दर्ज की और वे मुख्यमंत्री बने। 1986 में जब भारत और एमएनएफ के बीच मिजो शांति समझौता हुआ तो उन्होंने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया। इसके बाद एमएनएफ के नेता पु लालडेंगा मुख्यमंत्री बने।