बनारस जहां की गलियों में आज भी संस्कृति और परंपरा का रस बरसता है। गंगा किनारे बसी बाबा विश्वनाथ की नगरी को घटों और गलियों का शहर कहा जाता है। जितने घर हैं उतने मंदिर। कहते हैं काशी के कंकड़-कंकड़ में शिव का वास है। यहां भारत की सभी संस्कृतियां, परंपराएं लघु-दीर्घ रूप में जरूर मिलेंगे। और यही इसकी खासियत है।

बनारस हिंदू धर्म का प्रमुख तीर्थस्थल है। कला-संगीत और शिक्षा की भागीरथी भी यहां से निकलती है। हिंदू धर्म में मान्यता है कि वाराणसी में मृत्यु होने पर सीधे मोक्ष प्राप्ति होती है। यही कारण कि लोग अपना अंतिम समय शिवधाम में बिताना चाहते हैं।

यहां आप बाबा विश्वनाथ मंदिर, ज्ञानवानी, काल भैरव, दुर्गा कुंड, तुलसी मानस मंदिर, संकट मोचन मंदिर, भारतमाता मंदिर और सबसे खास बनारस में गांगा के छोटे-बड़े 84 घाट हैं। जिनमें अस्सी घाट से लेकर राजघाट तक पैदल घूमने का अपना ही मजा है। अस्सी घाट के नजदीक ही महारानी लक्ष्मीबाई का जन्मस्थल है। आगे दसाश्वमेध घाट, मणिकर्णिका घाट, राजेंद्र प्रसाद घाट और भी। सुबह-शाम इन घाटों पर घूमने का अपना ही आनंद है। बनारस के घाट पर बैठकर सूर्योदय देखना अपने आप में अद्भुद अनुभव है। फिर शाम को गंगा आरती देख सकते हैं।


कैसे आएं:
बनारस आने के लिए देश के लगभग हर कोने से रेल यातायात सुलभ है। यहां का बाबतपुर हवाई अड्डा दिल्ली सहित सभी प्रमुख शहरों से जुड़ा है। स्थानीय परिवहन के लिए ऑटो, किराए पर टैक्सी सुलभ है।


कब आएं: सभी मौसम यहां के लिए अनुकूल हैं। गर्मी के बावजूद बनारस की सुबह और शाम बहुत सुहानी होती है।