नोबेल पुस्कार से सम्मानित, बाल अधिकार कार्यकर्ता कैलाश सत्यार्थी ने भारत में बच्चो के विरूद्ध यौन अपराधों एवं अन्य विभिन्न प्रकार के बढ़ते अपराधों पर कहा कि हमें इस मुद्दे पर कानून बनाने के साथ साथ लोगो में जागरूकता और चेतना लाना बेहद जरुरी है। 

सत्यार्थी अपने भारत यात्रा कार्यक्रम के तहत आज यहां पहुंचे। उन्होंने कहा कि ऐसे अपराधों की रोकथाम हेतु संबंधित जांच एजेंसियों के पास पर्याप्त न्यायिक शक्ति हैं। उन्होंने कहा मंगलवार को आवश्यकता हैं ऐसे प्रकरणों में संपूर्ण न्यायिक शक्तियों का तेजी से क्रियान्वयन कर प्रकरणों का निपटान किया जावे। 

उन्होंने बच्चों के संरक्षण हेतु पारित यौन अपराध अधिनियम (पोक्सो) के अनुपालन में सुधार की संभावनाओं पर प्रकाश डालते हुए कहा कि गत वर्ष पाक्सो एक्ट के तहत 15 हजार प्रकरण दर्ज किए गए हैं, जिसमे से केवल 4 फीसदी मामलों में ही सुनवाई पूर्ण होकर सजा हो पाई हैं। ऐसे 6 फीसदी मामलो में आरोपी छूट गए हैं। जबकि 90 फीसदी प्रकरण आज भी लंबित हैं। ऐसी स्थति से निपटने के लिए जिला स्तर पर ऐसे मामलो के विचारण के लिए विशेष फास्ट ट्रेक न्यायालय स्थापित किये जाने की आवश्यकता हैं। 

उन्होंने मौजूदा व्यवस्था पर प्रश्न चिन्ह लगाते हुए कहा कि यदि आज के बाद यौन शोषण का एक भी मामला न हो तो कुछ राज्यों में 10 साल और कुछ राज्यों में 40 साल तक इन मामलों के निपटारे में लग जायेंगे। ऐसे प्रकरणों की आगामी 40 वर्ष बाद तक अदालतो में सुनवाई चलती रहेगी। जो पीडि़तों के लिए न्यायोचित स्थति नहीं हैं। 

सत्यार्थी ने अपनी भारत यात्रा के संबंध में जानकारी देते हुए कहा कि इस यात्रा के माध्यम से हम बच्चों के विरूद्ध होने वाले विभिन्न प्रकार के अपराधों के प्रति लोगो में जागरूकता लाने का प्रयास कर रहे हैं। इस मुहीम के तहत देश की न्यायपालिका, कार्यपालिका, विधायिका और मीडिया तक अपनी बात पहुंचाने का प्रयास कर रहे हैं। हमें देश के विभिन्न न्यायालयो का साथ बखूबी मिल रहा हैं। 

उन्होंने दावा किया कि इसी क्रम में कर्नाटक उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधिपति ने वादा किया कि वे स्वयं बाल अपराधों के प्रकरणों की निगरानी करेंगे। इसी प्रकार महाराष्ट्र उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधिपति ने कहा कि हैं की वो सुनिश्चित करेंगे कि बाल अपराधों के मामले में अस्पतालों के अन्दर एक दल गठित किया जाए। जिसमें एक बाल मनोचिकित्सक, एक बच्चों का चिकित्सक, एक $कानूनी अधिकारी, और एक पुलिस अधिकारी शामिल हो। जिससे ऐसे मामलो की शिकायत प्राप्त होने पर कानूनी कार्रवाई की जाए और ये भी देखा जाए कि बच्चों को मनोवैज्ञानिक चिकित्सा और शारीरिक चिकित्सा पीडि़तों को मिल रही या नहीं। 

उन्होंने कहा कि हमारे यहां दुर्भाग्य है कि गरीबों के बच्चों के साथ दुष्कर्म होने उन्हें सामान्य मरीजों की तरह थोड़े दिन अस्पताल में उपचार हेतु रख कर हफ्ते-दो हफ्ते बाद अस्पताल से छुट्टी दे दी जाती हैं। जबकि ऐसे प्रताडि़त बच्चों की मानसिक शारीरिक स्थिति ठीक नहीं होती हैं। जबकि आर्थिक रूप से सक्षम लोगों के मामले में ये संभव है कि वे मनोचिकित्सक के पास चले जाये। ऐसे पीडि़तों को दुर्दांत स्थति से सहज बाहर लाने के लिए आवश्यक परामर्श मिल जाता हैं। 

बता दें कि लोगों में जागरुकता लाने के लिए कैलाश सत्यार्थी ने ग्यारह सितम्बर को कन्याकुमारी से शुरू की थी। इसके बाद वे गुवाहाटी, सिलीगुड़ी सहित देश के विभिन्न शहरों में गए। उनकी यह यात्रा 16 अक्टूबर को नई दिल्ली समाप्त होगी।