अफगानिस्तान की राजधानी काबुल में दाखिल होने और राष्ट्रपति भवन पर तालिबान के कब्जे के बाद रविवार को मुल्ला अब्दुल गनी बरादर ने संक्षिप्त वीडियो संदेश जारी किया है। उन्होंने कहा है कि शासन की असली परीक्षा शुरू होने वाली है। मुल्ला अब्दुल गनी बरादर तालिबान राजनीतिक ब्यूरो प्रमुख और दोहा में कई दावेदारों के साथ राजनीतिक समझौता के लिए बातचीत करनेवाली टीम का हिस्सा हैं।

गौरतलब है कि तालिबान ने अफगानिस्तान के 34 प्रांतीय राजधानियों को दो हफ्ते से भी कम समय में अपने नियंत्रण में ले लिया है। अफगान राष्ट्रपति अशरफ गनी के पूर्व सलाहकार शफीक हमदम ने उनके मुल्क छोड़ने के फैसले की आलोचना की है। वाशिंगटन से अलजजीरा को उन्होंने बताया "ये शर्मनाक है। ये अपमानजनक है। लोग ठगा हुआ और अकेला महसूस कर रहे हैं।" हालांकि, गनी ने फेसबुक पर जारी बयान में अपने इस कदम को उचित ठहराते हुए कहा है कि उनका मकसद और खून खराब को रोकना था। उन्होंने लिखा, "तालिबान ने तलवार और बंदूक के बल फैसले से जीत हासिल की।" इन सबके बीच सवाल पैदा हो रहा है कि आखिर तालिबान हैं कौन और उनकी मंशा क्या है?

1994 में मुल्ला मोहम्मद उमर ने दर्जनों समर्थकों के साथ तालिबान की स्थापना की। गृह युद्ध के दौरान भ्रष्टाचार और बेतहाशा अपराध को चुनौती देना ग्रुप की स्थापना का मकसद था। तालिबान का शाब्दिक मतलब होता है 'छात्रों' पुश्तों में, मुल्ला उमर के संस्थापक सदस्यों के छात्र होने के संदर्भ में बोला जाता है। ग्रुप ने कथित 'मुजाहिदीन' लड़ाकों से सदस्यों को लिया जिन्होंने 1980 के दशक में अफगानिस्तान से तत्कालीन सोवियत संघ को बाहर किया। उसने 1996 तक मुल्क के ज्यादातर हिस्सों को नियंत्रण में ले लिया और करीब पांच वर्षों तक शासन किया।

अफगानिस्तान में तालिबान की तरफ दुनिया का ध्यान 11 सितंबर, 2001 को वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर हमलों के बाद गया। तालिबान पर न्यूयॉर्क में हुए हमलों के प्रमुख संदिग्धों ओसामा बिन लादेन और उसके अलकायदा आंदोलन को शरण देने देने का आरोप था। 7 अक्तूबर, 2001 को अमेरिका की अगुवाई में सैन्य गठबंधन ने अफगानिस्तान में धावा बोला, और दिसंबर के पहले सप्ताह तक तालिबान शासन के अंत का दावा किया।