दिवाली के त्योहार में से एक गोवर्धन पूजा (govardhan puja) भी है। हिंदू धर्म में गोवर्धन पूजा का विशेष महत्व है। इस दिन गोवर्धन पर्वत, गोधन यानी गाय और भगवान श्री कृष्ण की पूजा की जाती है। इस साल 28 अक्टूबर यानी आज गोवर्धन पूजा (govardhan puja) की जाएगी। कार्तिक मास में शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा यानी दिवाली के दूसरे दिन गोवर्धन पूजा करते हैं। गोवर्धन पूजा दिवाली के अगले दिन मनाई जाती है। इस दिन घर में किसी जगह ज्यादातर आंगन में गोबर से गोवर्धन पर्वत, गायों, ग्वालों आदि की आकृति बनाकर पूजा-अर्चना की जाती है। साथी ही परिक्रमा कर छप्पन भोग का प्रसाद बांटा जाता है।

गोवर्धन पूजा पर्व तिथि: 28 अक्टूबर 2019, सोमवार।

गोवर्धन पूजा सायंकाल मुहूर्त : 03:25:46 से 17:39:44 तक।

अवधि : 2 घंटे 13 मिनट तक।

इस दिन अन्नकूट बनाने का भी खास महत्व है। इसलिए इसे अन्नकूट पूजा भी कहा जाता है। इस दिन भगवान श्री कृष्ण ने इंद्र का अभिमान चकनाचूर कर बृजवासियों की रक्षा की थी। इसलिए इस दिन भगवान श्री कृष्ण की पूजा का भी विशेष महत्व है। बता दें कि गोबर से गोवर्धन की आकृति तैयार करने के बाद उसे फूलों से सजाया जाता है और शाम के समय इसकी पूजा की जाती है। पूजा में धूप, दीप, दूध नैवेद्य, जल, फल, खील, बताशे आदि का इस्तेमाल किया जाता है। कहा जाता है कि गोवर्धन पर्व के दिन मथुरा में स्थित गोवर्धन पर्वत की परिक्रमा करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है, लेकिन लोग घरों में प्रतीकात्मक तौर पर गोवर्धन बनाकर उसकी पूजा करते हैं और उसकी परिक्रमा करते हैं।

ऐसी है मान्यता

कहा जाता है कि जब कृष्ण ने देखा कि सभी बृजवासी इंद्र की पूजा कर रहे थे। जब उन्होंने अपनी मां को भी इंद्र की पूजा करते हुए देखा तो सवाल किया कि लोग इन्द्र की पूजा क्यों करते हैं। उन्हें बताया गया कि वह वर्षा करते हैं, जिससे अन्न की पैदावार होती और हमारी गायों को चारा मिलता है। तब श्री कृष्ण ने कहा ऐसा है तो सबको गोर्वधन पर्वत की पूजा करनी चाहिए क्योंकि हमारी गायें तो वहीं चरती हैं। उनकी बात मान कर सभी ब्रजवासी इंद्र की जगह गोवर्धन पर्वत की पूजा करने लगे। देवराज इन्द्र ने इसे अपना अपमान समझा और प्रलय के समान मूसलाधार वर्षा शुरू कर दी। तब भगवान कृष्ण ने गोवर्धन पर्वत को अपनी छोटी उंगली पर उठा कर ब्रजवासियों की भारी बारिश से रक्षा की थी। इसके बाद इंद्र को पता लगा कि श्री कृष्ण वास्तव में विष्णु के अवतार हैं और अपनी भूल का एहसास हुआ। बाद में इंद्र देवता को भी भगवान कृष्ण से क्षमा याचना करनी पड़ी। इन्द्रदेव की याचना पर भगवान कृष्ण ने गोवर्धन पर्वत को नीचे रखा और सभी ब्रजवासियों से कहा कि अब वे हर साल गोवर्धन की पूजा कर अन्नकूट पर्व मनाए। तब से ही यह पर्व गोवर्धन के रूप में मनाया जाता है।